Wednesday, October 28, 2026

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सुजीत

Nov 9, 2024, 6:24 PM

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(0:01) मैंने पढ़ाई एक गल्च स्कूल से शुरू की थी, वहाँ फौर्थ स्टार्डर्ड तक को एजुकेशन था, रड़की रड़कीया साथ पढ़ते थें. (0:20) फौर्थ पास करने के बाद स्कूल छोड़ देना पढ़ता था, किसी अंड्ये स्कूल जाना पढ़ता था, लिहाज़ा 15, दर्जाब 5 में मेरा भी admission एक boys school में हो गया. (0:44) Boys school के शुरू के दिन 2-3 साल बहुत कश्ट के थे, बड़े लड़कों से, अपने उशे क्लास के लड़कों से कैसे पेशाना है, जो लोग धखा, वो की बार पीट करते हैं, बुली करते हैं, उनसे कैसे पेशाना है.

(1:19) गल्स स्कूल ने मुझे इसका जरा भी अनुभव नहीं दिया था, लहाज़ा मार पीट की अनुभव जब भी कभी आती, तो मुझे तो सीधे सीधे रोना ही आता था, रोना आ जाता था. (1:38) एक दफ़ा का वाकिया है, हमारे साथ की दो चार लड़कों ने फुट्बॉल खेलने का बन बनाया, और हम लोगों ने फुट्बॉल लेके पाइदार के एक खोड़े में आपस में खेलना शुरू किया, तो हमसे उचे दरजे के दरजा छे के लड़के, पता नहीं कहां से � (2:03) तपके, धक्का बार के हम लोगों को गिड़ा दिया, बॉल छीड़ की चलते बने, मैं तो खोड़े में बैटके रोड़े लग दिया, दर गया भै, पूरा पाँच, दरजा फिफ्ट का पूरा एक साल बहुत ही कश्ट का बीदा, (2:29) खेर दरजा छे पहुचा, कुछ डैला के आ गए, उन में एक सुझीत करके एक लड़का था, जो आया तो हम लोगों के क्लास पर था दरजा छे बे, लेकिन इसकी उबर थोड़ा जादी थी, और शायद हम लोगों से तो तीन साल, चार साल बड़ा था, और शरीर से अथले� (3:13) वाले लड़के थे, एक दिन फिर वा धम के, जब हम लोग दरजा छे बे थे, लेकिन इस बाद हम लोगों के साथ वो एक दैला लड़का था, जोसका नाम सुझीत था, जोसका जिक्र भी मैं कर रहा था, वो उन लोगों से उलच गया, दरजा छे वालों से, और सबकी अच् (3:40) टी, टी, चार लड़कों के अच्छी पिटाई गर भी, हम लोगों को बड़ा अच्छा लगा, हम लोगों का सीरा चोड़ा हुआ, कि हम लोगों के साथ भी कोई मार पीट कर दे वाला लड़का है, कुछी बजनों में ये सावित हुआ, कि वो मार पीट ही नहीं, बह� (4:14) परिशन पाता है, उशी कोद और लंभी कोद में भी अच्छा करता है, या नहीं कोई मिला करके, वो एक स्पोर्समेड और काफी टॉफ लड़का था, बहुत पापुलर हो गया, हम लोगों के बीच में बहुत पापुलर हो गया, कुछ दिनों बाद मालों पड़ा, कि ये � (4:38) आप गाते ही बहुत अच्छा है, बहुत सुर में गाते हैं, बहुत अच्छा गाते हैं, और ज़्यावितर महुबब जैफी की गानें बहुत अच्छा गाते हैं, दिन बीटे, कुछ दिन बाद एक पार्टी में गए हम लोग, किसी बच्चे की बर्डे पार्टी थी ह (5:02) खाया पिया, बहुच बस्ती किया, घर आके हमने कहा, अपने घर में, नानी के साथ मैं रहता था, नानी से कहा, नानी हमारी भी बर्डे बनाओ, बराबर है कि हमारा भी बर्डे बने, तो हमने कहा, ठीक, अगले बज़े तुम्हारी बर्डे पढ़डे वाली है, (5:27) अपने थी चार, दोस्तों को लेते आ रहा, और यहां पे कुछ बगा लेंके, बाजार से, कुछ घर में बन जाएगा, पार्टी हो जाएगी, रहा था बर्डे बनी, कोका-कोला की बोतले आ गई, 8-10, बाजार से समोसा वगरा आ गया, विठाईया कुछ आ गई, घर में ना (5:55) बना दिया, पूरी बगारा बना दिया, और वह अपने 5-6 साथियों को लेके बर्डे किया, तो उसी में से किसी ने कह दिया नानी को सुजीत के लिए, कि नानी जी यह रखा गाता बहुत अच्छा है, नानी को हमारे गाने का बड़ा शौक था, उस जबाने में, (6:24) सन पचास के ज़ावाने में उनके पास एक चावी बढ़ने वाला ग्रावफोर्ट हुआ करता था, और कोई बढ़िया गीद बाजार में रेकॉर्ड आता, 78 RPM का, और बहुत पॉपलर गाना कोई होता तो उनके पास जरूर होता, तब आप उस ज़ावाने के अभीर भाई कर (6:46) राटिकी, उमा देवी, गीता दर्ध, लता वंगेश्कर, और किसके किसके गाने उनके पास हुआ करते थे, तो वहों न सुझीत से कहा कि गाना सुणाओ बेटा, कोई गाना सुणाओ, तो वहोंने कोई, सुझीत ने कोई डबा उठा लिया बगल में, शायद रेकॉर्ड का (7:15) ही डबा था, वह ग्रावफोन का ही डबा था, और उस पर थाप और ताल दे करके यहोंने गाना शुरू किया, तीन चार गाने गए, बढ़ा अच्छा गए, एक गाना कोई ऐसा था, शायद बैजुबावना का गाना था, इसकी लय बहुत उची जाती थी, बढ़ा उचा � (7:37) पड़ता था, वह गाना चल रहा था कि उसकी आवास बार-बार शायद दीशे जा रही थी, जहां बारे दाना जी बैठा करते थे, उनके कानों भे आवास पड़ी, उस उची तांट की, वह उपर आ गया है, उनको गाना बजाने से थोड़ा दफरत थी, दोनों का, दानी का (8:00) आपकी पसंद कुछ और थी, राणा जी की पसंद कुछ और थी, तो वहों लोगों चेखा एक बार आ करके हम लोगों को फिर दीशे चले गया है, उन्हें कुछ हल्ला-गुल्ला गाना बजाना पसंद आया रही, तो हम लोगों ने कारेकरम थोड़ी दिर बार स्थगित कर � (8:20) दिया, जब नारा जी का बूब देखा के बहुत अच्छा नहीं है, तो स्थगित कर दिया, और सब लोग अपने अपने घर जाने को, उपर से नारा जी को चले सपर्श करके सब लोग जाने लगे, तो सुझी जब नारा जी के बगल से होकर के बाहर दिकल रहा था, तो ना (8:50) सुझीत को पहचान लिया है, और कहा सुदो सुदो, तो वो हभी पुरा महले में रहते हो, तो उसने कहा जी हा, कहा वो बजार के सापने जो लाल रग का क्वार्टर है, तो उसी में रहते हो, तो उसने कहा जी हा, मैं उसी क्वार्टर में रहता हूँ, (9:18) तो वो सब्जन ने बड़े रोष से, सुझीत से कहा कि तुम्हारी हिपत कैसे हुई कि तुम सब लोगों के साथ बैठके चोके में खारा पीरा कर रहे थे, राला जी नजी ग्यासा से उनके मोह के तरफ देखा, हम लोग भी हत परम हो गये, (9:50) खार उन्होंदे उस समय सुझीत से कहा कि जाओ, दुबरा यहां बताना, मुझे बड़ा बुला लगा कि घर बेरा है, यह कौन होते है काने वाले कि दुबरा यहां बताना, खार जब सब बच्चे चले गए, तो सज्जन ने कहा कि यह डोब खाने में रहता है, उसी विरा� (10:21) वो थोड़ा पुरातर पर्थी लोग थे, इसलिए उनकी प्रतिक्क्रिया वैसी हुई, लेकिन मुझे तो एकडब से हेदे तक यह बीद गई बात और उसका रतीजा यह हुआ कि बात पर जब मैं परिवार चलाने काविल हुआ तो मैंने कभी अपने घर में काप करने � (10:48) और ऊंसरों से, उनकी जाती नहीं पूछी, नतीजा ये हँआ कि हमारे यहां काव करंमे वाले अकसर बहुत छोकी जात के हो जाये करते थे, और मैं किसी को बताता भीने थे, अगर मुझे बालोก (11:03) कि ये चोटी जाध का है तो मैं किसी से बाता था मेरे विटा, चोके का काम तक मैं उन लोगों से ले लेता था. और ये आज भी चल रहा है, ये जीवन परियंत मैं दे, उस एक घट्टा ने मेरे उपर इतना गहरा प्रभाव डाला, जो हमारे दर्वाजे पर सुझीत का दिरा (11:34) नहीं बदल दी.

खैर, बात आगे बढ़ी, दर्जा साथ, दो साल वो पढ़ा हम लोगों के साथ, साथ के बाद उसकी पो कहीं आओर चला गया. (11:56) तो उसके इंटा रहने से हम लोगों को दुख तो हुआ, बहुत पपुर्ण रखा था, बढ़ा हस्पुक रखा था, खेलने कुलते वे अच्छा था, क्लास में सबका मन उसके चलते लगा रहता था, तो दर्जा आठ में जब हम लोग पहुँँँ तो वो सुझीत हम लोग (12:30) और वो अब दौकरी करेगा, आगे पढ़ाई नहीं करेगा, थेर समय बीटता गया, फिर मेरा admission हो गया medical college में, तो जब मैं first year में था, और मेरा छोटा भाई competition की तैयारी कर रहा था, (13:03) तो एक दफ़ा वो बनारस आया, मेरा छोटा भाई, ये लोग सुवराची रहते थे, बनारस आया, तो उसका बन हुआ बनारस का मीठा पान खाने का, तो उसको हमारे घर के पासर ही चोड़ा है, एक बड़ी अच्छी पान जी दुखान थी, वहाँ गये, वहाँ पान लग� (13:29) दी, गुड़ी वीडिंग सर जी, गुड़ी वीडिंग सर जी, तो मुण के देखा, तो ये सुझीत ख़ड़ा था, और हमने कहा कहा हो भाई, कहा सर जी, हम ट्रेलिंग ले रहा हैं गोरकपूर में, और जल्दी ही नोकरी में आ जाएगे, (14:03) और मैंने भाई के तरफ इशारा करके पूछा, कि ये कौन है सर जी, हमने कहा ये मैंने चोटे भाई है, लेकिन तुम ये सर जी सर जी के अलगा रखे हो, तो कहा कि मुझे बालू है कि आप डॉक्टर बन गए हैं, और ये भाईया जी, जो आपके हैं, इनके चेहरा देखने (14:31) से लगता है, ये कोई बहुत बड़े आफसर बढ़ने वाले हैं, और हमारी क्या आउकात है, हम ओट बढ़ेंगे तो खालासी बढ़ेंगे, तो सर जी तो कहेंगे ही न, अच्छा हमने गौर किया, कि वो जब सर जी कहता था, तो सर जी को कहते समय, वो सर थोड़ा आगे ज� (15:04) हमने कहा, कुछ भी हम बढ़ेंगे, कुछ भी हम हैं, लेकिन तुम तो हमारे क्लास फेलो हो, तुम तो हमारे मित्र रह चुके हो, कहा, नहीं सर जी, वो बात अलग है, और ये बात अलग है, जो है सो हकीकत है, सो रहेगी, (15:26) आप बालिक हो जाओगे, हम लोकर रह जाओगे, और सर जी ऐसे ही ठीक है, पाड़ उसको भी खिलाया हमने, हमलोगों तो भी पाड़ जमाया, और हाल चान, सुप समाचान हुआ, बात बात पर उसने ये बताया, कि वो अभी मरते मरते बचा है, (15:55) एक लबा चीरे का निशाद था, उसके टा सर जी, मेरा एक फेफ़डा जा चुका है, मैं एक ही फेफ़डा पर हूँ, मेरा एक फेफ़डा बैट गया था, उसका अभी कुछ महीने पहले आपरिशट हुआ है, अभी हमारा वेडिकल टेस्ट होगा, अगर वेडिकल टेस्ट (16:19) वेडिकल गए, तो आपको डौकरी भिलेगी, इन्हें तो हो सकता है कि आपको डौकरी डव ही भिले, खेर पानवान खा के हम लोग अपने रास्ते बिदा हुए, फिर अडेक बर्शों तक सुझीत का कोई आता पता नहीं था, कोई आता पता नहीं था, (16:44) सब में के ठपेडे, जिसको जहां ले जाए, वह वही का हो जाता है, मैं अपने वेडिकल टेस्ट पे रस्त था, एक दफ़ा किसी कार से मैं दिली गया हुआ था, तो दिली से जब लोक रहा था, (17:07) तो शायब मेरट के आगे, कही मैं अपने कमपार्टमेट में लेटा हुआ था, एसी फ़स्ट या फ़स्ट क्लास का कमपार्टमेट था, चार बर थी, नीचे की सीट पर एक सरद तरफ मैं लेटा था, एक तरफ एक माता जी लेटी हुई थी, उपर माता जी के साथ के दो ल (17:35) मैं लेटे हुए थे पर था, और उस दिख मैं जेवन से ज़्यादे ठक चुका था, सुबह से, शाम तक बहुत पैदल चलना पढ़ा था, यहाँ वहाँ, बहुत ठक जा था, लेटते ही, लेटते ही मुझे नीदा गई थी, एसी ज़्यादा तेज़ चला करता है, बहुत ठ (18:00) धक के मैं धल से सो गया था, तो शायद मेरट के आगे कहीं आवाज आई, आवाज आई, खाना लगेगा सर्जी, खाना लगेगा सर्जी, तो इस सर्जी पर, सर्जी यह काल में पढ़ा तो थोड़ा मुझे लगा, यह तो सर्जी जिस लह्ज़े से बोल रहा है, यह सुना ह� (18:26) सा लग रहा है, लेकिन नीद इतनी गहरी थी, कि कबल उठाके, बत्ती जलाके, देखने का भिमद हुई नहीं, खर उसने बाकी तीन बारी लोगों से पूछ लिया, क्या खाना है, फिर हमारे तरफ, हमारा, (19:07) हमारे तरफ, हमारे तरफ, हमारे तरफ, हमारे तरफ, हमारे तरफ, हमारे तरफ, हमारे तरफ, हमारे तरफ, हमारे तरफ, हमारे तरफ, हमारे तरफ, हमारे तरफ, हमारे तरफ, हमारे तरफ, हमारे तरफ, हमारे तरफ, हमारे तरफ, हमारे तरफ, हमारे तरफ, हमारे तरफ, ह (19:16) हमको लग तो गया था कि हो न हो ये सुझीत है, लेकिन हमने सोचा कि राद घंटा बाद जब खाना आएगा, तब भले हम उड़ जाएगे, लेकिन इस समय तो उठके बैशके बाचीत करने के कुछ कि हिम्मत नहीं पड़ी, क्योंकि वो बातूरी लड़का है, उज्ञा ले (19:34) जाएगी, तो हमको 10-20% तो ये शक्ता कि हो न हो ये वही है, लेकिन कर्फर्ब कर दे कि हिम्मत मेरी पड़ी नहीं, तो हमने कहा कि वैश खाना लगेगा, इतने में बड़ी जोर का हल्ला हुआ, बड़ी जोर का हल्ला हुआ, D compartment में हम लोग थे, A या B से भविजण बची, � (20:06) पकड़ो, पकड़ो, चोर, चोर, पकड़ो, पकड़ो, चोर, चोर हुआ, कोई भागा हमारे D compartment के सामने से, तो ये जो order लेने लड़का आद्भी आया था, इसने हाथ की किताब पटकी, और जो भाग रहा था उसके पीछे भाग लिया, (20:33) और इस भगदर में, कोलाहल में, नीद हमारी तूट गई, मेरी नीद तूट गई, मैं भी उड़ बैठा, तब तक ड्रेन भी धीले धीले पड़ गई थी, शायद कोई station ही था, पहुँच, पहुँच, किसी station पर हम लोग पहुँच चुके थे, तब तक किसी ने उधर से आ (21:10) बड़ गई, ये सब क्या हो रहा है, कहें बहुत जोर चूट लगी हैं, वो बच्चे नहीं होगे, बड़ गई, दोरों का बाता फट गया है, ऐसा बोला कोई, तो मैंने अपने सिधारे रखे हुए बैग से अपना आला निकाला, एक सेहाज डॉक्टर की प्रतिक्रिया (21:30) होती है, कि अगर कोई मदद कर रहे है, सिच्वेशर है, अगर आप कुछ मदद कर सकते हैं, तो जरूर करेंगे, आला निकाला, और बाता जी जो बारे बगड़ में बैठी थी, उससे अमने कहा, बाता जी, सहाबाद ज़राद देखते रहिए न, ये लगता है कि आ� (22:01) भी कूदे थे, जो चोर था वो, और उसके पीछे ये थे, हावारे सर्जी, ये भी कूद गय थे शायद, तो वहाँ से हम लोग 30-40 गज आगे लिकल आये थे, अपने कपार्ट्बेट से उतर के पहुचा, तो वहाँ देखा, कोहा कहा, रिश ये तो जड़ा, दरदराक � (22:28) ये जो दोनों कूदे, ये जाके खब्बे से, और जो सीमेंट की, बैट्रे की सीट होती है, उससे इन लोगा सर लड़ गया, तो एक बॉर्णी जो दिखाई दे रही थी, उसके गले में सोने की मोटे सी चेर थी, और उसकी गर्दन तेड़ी थी, एकदब तेड़ी थी, (22:57) यहने उसकी गर्दन तूक चुकी थी, और वो इस्पंदन भी ही पड़ा हुआ था, और खोड से लट पड़ा हुआ था, बाते पे चोट लगी थी, गर्दन तूट गयी थी, (23:10) तो गर्दन, गले पे हाथ लगा के देखा, तो उसके कोई पल्स नहीं था, तप तक स्टेशन बास्टर वगरा भी पहुंच चुके थे, तो उन्होंने उसने कहा कि देखे, चूचा बद करिये, दोनों के अगर डेथ हो गयी है, तो पुलिस आयेंगी, बोड़ी को आप डि (23:40) बीट नहीं सुड़ाई पड़ी, उनको समझ में आ गया है स्टेशन बास्टर को कि मैं कोई डॉक्टर हूँ, अच्छा दूसरा बॉड़ी ते पर देख गए, तो वो औधा बो पड़ा हुआ था, मुँ नीशे था, माथा उसका भी फ़टा था, उसकी बॉड़ी में रह र (24:16) और चेहरा देखने की इच्छा हुई हवारी, तो बॉड़ी को टर्ड करना चाहा, तो गार्ड एफिर वहाँ से जो थे वो सज्जड, उन्होंने फिर बना किया कि बॉड़ी को डिस्टर्ब बत किये, आभी पूलिस आएगी, मैंने उनकी बात को अन्सुड़ा किया, और च (24:49) पूरा इसकी जो बसंसम उत्रा हुआ था, अंदर दाद तो जवड़ा तक खुळा दंगा दिखाई दे रहा था, बड़ा भी भत से दृश्य था, खोर से लट भत, पहचाद में आने की तो बात नहीं रही थी कि कौसी शकल है, क्या शकल है, लेकिन रहा नहीं गया, मुझे (25:13) एका एक ख्याल आया, मुझे एका एक ख्याल आया, तो मैंने उनकी उसकी कभीज उठाई, पीट-पीट के तरफ से कभीज उठाई, कभीज उठाई तो वोई लम्बा सा चीरा, पुराणा कभी आपरेशन हुआ होगा, वो साफ दिखाई पढ़ा था, मैंने कहा अरे ये तो (25:37) सुझीत है, ये वोई सरजी वाला सुझीत है, ओहो, बहला भर आया, बहुत तकलीफ हो गई, इतने साल मिला, कबरे में आया, (25:54) खड़ा भी था, ती विरट, चार विरट, चाहता तो हालो, हाओ, द्यू, मैं कर सकता था, हाल, चाल, पूछ सकता था, लेकिन वारे नीद के और आलश के, मैंने किया नहीं, और उसके बाद पौका भी नहीं मिला, आखे उसकी खुली हुई थी, (26:16) आखों को बंद किया उसके, अपना रुमान लिकाला मैंने, रुमान से उसके चिहरे को धखा, तो गार के पूछा क्या आप, इससे पूरो परचित हैं, मैंने सर हिलाया, सर हिलाया, मैंने कहा, ये बारा, शायद वे बेरा पुरा ना, परचित है, बेरा केशिट है, और शाय (26:51) सुझीत है, तब तक भीर में से एक आदमी बोला कि हा, हा, हा, ये सुझीत ही है, हम लोग इसको बादार्सी करते हैं, ये सुझीत ही है, खर तब तक पुलिस भी आ गई, उन लोगों ने अपनी कारवाई शुरू की, मैं धीरे धीरे भीर से बाहर आ गया, अपने डबे के (27:16) तरफ आ गया, एक चेन सोने की, जिसने दो जाने अनायास लेनी, (27:28) कब्रे में आया, तो माताजी ने पूछा, चेन विली की नहीं विली? (27:34) अरे अपने कहा, माताजी चेन की तो छोड़ो, नहां तो दो जाने चेनी गई, माताजी ने कहा, (27:47) चोरी करेगा तो बड़ेगा ही

 


सुधारित टेक्स्ट:

सुजीत

मैंने अपनी पढ़ाई एक छोटे से स्कूल से शुरू की थी, जहाँ केवल चौथी कक्षा तक ही शिक्षा दी जाती थी। लड़के और लड़कियाँ साथ-साथ पढ़ते थे। चौथी कक्षा पास करने के बाद उस स्कूल को छोड़ना पड़ता था और किसी दूसरे स्कूल में दाखिला लेना होता था। इसी तरह, मैंने भी पांचवीं कक्षा में एक लड़कों के स्कूल में प्रवेश लिया।

लड़कों के स्कूल में शुरुआती 2-3 साल मेरे लिए काफी कठिन रहे। वहाँ बड़े लड़कों से और अपनी ही कक्षा के कुछ छात्रों से सामंजस्य बैठाना चुनौतीपूर्ण था। जो बच्चे धक्का-मुक्की और मार-पीट करते थे, उनसे निपटना मेरे लिए एक नई समस्या थी।

गर्ल्स स्कूल में मुझे इन सबका कोई अनुभव नहीं हुआ था, इसलिए जब भी मार-पीट की स्थिति बनती, तो मुझे रोना आ जाता था। एक बार की बात है, हमारे कुछ साथियों ने फुटबॉल खेलने का तय किया। हमने मैदान के एक कोने में फुटबॉल लेकर खेलना शुरू किया। तभी छठी कक्षा के कुछ बड़े लड़के आए और हमें धक्का देकर गिरा दिया, हमारी बॉल छीन ली। मैं मैदान में बैठकर रोने लगा।

पाँचवीं कक्षा का पूरा साल इसी तरह डर और परेशानी में बीता। फिर छठी कक्षा में एक नया लड़का हमारी कक्षा में आया। उसका नाम सुजीत था। वह हमसे उम्र में तीन-चार साल बड़ा और काफी मजबूत शरीर वाला था।

एक दिन जब फिर से छठी कक्षा के लड़के हमें परेशान करने आए, तो सुजीत उनसे भिड़ गया। उसने चार-पाँच लड़कों की पिटाई कर दी। हमें बहुत अच्छा लगा। ऐसा लगा, जैसे अब हमारे पास भी एक ताकतवर साथी है। सुजीत न केवल लड़ाई-झगड़े में माहिर था, बल्कि खेल-कूद और पढ़ाई में भी अच्छा था। वह जल्दी ही बहुत लोकप्रिय हो गया।

कुछ दिनों बाद पता चला कि सुजीत गाना भी बहुत अच्छा गाता है। उसकी आवाज में गजब का सुर और लय थी। खासकर मुकेश और रफी के गाने वह बेहद खूबसूरती से गाता था। एक बार मेरी नानी ने सुजीत से गाने की फरमाइश की। सुजीत ने घर के पुराने ग्रामोफोन के डिब्बे पर ताल देकर कुछ गाने सुनाए।

उसके गाने सुनकर नानी बहुत खुश हुईं, लेकिन उसी दौरान मेरे दादा जी आ गए। उन्हें गाना-बजाना बिल्कुल पसंद नहीं था। उन्होंने गुस्से में कार्यक्रम रुकवा दिया। जब सुजीत जाने लगा, तो दादा जी ने उसे पहचान लिया और पूछा, "क्या तुम वही हो जो डोब (नीची जाति) में रहते हो?" सुजीत ने सिर झुकाकर कहा, "जी हां।"

दादा जी ने गुस्से में कहा, "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहाँ बैठकर खाने-पीने की?" यह बात मुझे बहुत चुभी। उसी दिन मैंने तय किया कि कभी किसी इंसान को उसकी जाति के आधार पर नहीं आंकूंगा। जब मैंने अपना घर बसाया, तब मैंने जाति की परवाह किए बिना लोगों को काम पर रखा। इस घटना ने मेरे जीवन पर गहरा असर डाला।

सुजीत हमारे साथ दो साल तक पढ़ा। जब वह चला गया, तो हमें उसकी कमी खलने लगी। खेल-कूद हो या पढ़ाई, उसकी मौजूदगी से सबका मन लगा रहता था। समय बीता, मैं मेडिकल कॉलेज में चला गया। एक दिन बनारस में मेरा छोटा भाई आया, जो प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा था। वह मीठा पान खाने की इच्छा से पास की एक पान दुकान पर गया।

वहाँ पान लगवाते समय उसने सुजीत को देखा। सुजीत अब रेलवे में ट्रेनिंग कर रहा था। उसने मुझे "सर जी" कहकर संबोधित किया, जो मुझे अजीब लगा। मैंने उसे टोकते हुए कहा, "तुम मेरे क्लासमेट रहे हो, दोस्त हो। सर जी मत कहो।" लेकिन उसने जवाब दिया, "नहीं सर जी, अब आप डॉक्टर हैं और मैं आपकी बराबरी नहीं कर सकता।"

हमने पान खाया, बात की, और सुजीत ने बताया कि वह एक फेफड़े के ऑपरेशन के बाद मुश्किल से बचा है। वह अपनी नौकरी की मेडिकल टेस्ट क्लियर करने की तैयारी कर रहा था।

फिर कई साल बीत गए। एक दिन, जब मैं दिल्ली से लौट रहा था, ट्रेन में सुजीत की आवाज़ फिर से सुनाई दी। "खाना लगेगा, सर जी?" उसकी वही पुरानी आवाज़ थी। हालांकि मैं थका हुआ था, लेकिन इस बार उसकी पहचान पक्की हो गई थी। सुजीत फिर मिल गया था।

इस घटना ने मुझे अतीत की यादों में फिर से डुबो दिया। सुजीत ने अपने संघर्षों और हिम्मत से मुझे कई सबक सिखाए थे।

संवेदनशील घटनाओं का वृतांत

एक बार मैं कार से दिल्ली गया था। दिल्ली से लौटते समय, शायद मेरठ के आगे, मैं अपने डिब्बे में लेटा हुआ था। यह एसी फर्स्ट या फर्स्ट क्लास का डिब्बा था। चार बर्थ थीं। नीचे की एक बर्थ पर मैं लेटा था, दूसरी पर एक माताजी, और ऊपर वाली बर्थ पर उनके साथ के दो लोग थे। उस दिन सुबह से शाम तक बहुत पैदल चलना पड़ा था, इसलिए मैं बेहद थक चुका था। लेटते ही गहरी नींद में डूब गया। एसी ट्रेन की गति तेज होती है, और उसके शोर के बीच मैं गहरी नींद में सो गया।

कुछ समय बाद, अचानक किसी की आवाज़ आई—"खाना लगेगा, सरजी।" इस संबोधन से मुझे थोड़ा अचरज हुआ। आवाज़ जानी-पहचानी लगी, पर नींद इतनी गहरी थी कि उठकर देखने की हिम्मत नहीं हुई। मैंने सोचा कि जब खाना आएगा, तब देख लेंगे। लेकिन उस वक्त नींद को भंग करने का मन नहीं था।

तभी अचानक डिब्बे में हलचल मच गई। कोई चिल्लाया, "पकड़ो, पकड़ो! चोर, चोर!" हमारे डिब्बे के सामने से कोई भागा, और जो खाना लेने वाला व्यक्ति था, वह भी उसकी ओर दौड़ पड़ा। यह भगदड़ और कोलाहल सुनकर मेरी नींद टूट गई। ट्रेन धीमी हो रही थी, शायद किसी स्टेशन पर पहुँच रही थी।

डिब्बे से बाहर निकलकर देखा, भीड़ इकट्ठी हो चुकी थी। पता चला, भागते हुए दोनों लोग प्लेटफॉर्म से कूद गए थे। उनकी सिर पर गंभीर चोटें आई थीं। एक व्यक्ति के गले में मोटी सोने की चेन थी, और उसकी गर्दन अस्वाभाविक रूप से झुकी हुई थी। मैंने उसकी नब्ज़ देखी—वह मृत था।

दूसरे व्यक्ति का चेहरा ज़मीन की ओर था। उसका माथा फटा हुआ था, और खून बह रहा था। मैंने उसे पलटने का प्रयास किया, लेकिन स्टेशन मास्टर ने मना किया। मैंने उनकी बात अनसुनी कर दी और उसकी शर्ट उठाई। तभी मेरी नज़र उसके पेट पर पुराने ऑपरेशन के निशान पर पड़ी। मुझे लगा, "ये तो सुजीत है!" वही सुजीत जिसने कुछ देर पहले "सरजी" कहकर संबोधित किया था।

यह जानकर मेरा मन भारी हो गया। सुजीत की आँखें खुली थीं। मैंने अपने रूमाल से उसका चेहरा ढका और उसकी आँखें बंद कर दीं। पुलिस आ चुकी थी और अपनी प्रक्रिया शुरू कर दी थी।

मुझे माताजी ने पूछा, "चेन मिली?" मैंने जवाब दिया, "माताजी, चेन की तो बात छोड़िए, यहाँ तो दो जानें चली गईं।" इस पर माताजी ने गंभीर स्वर में कहा, "चोरी करेगा, तो मरेगा ही।"

 

Here’s the corrected and edited version of your transcript:


थोड़ी देर बाद, एक स्थिति ऐसी आई कि मैं सामने बैठी हुई माताजी के होंठों को हिलते हुए तो देख रहा था, पर वे क्या कह रही थीं, क्या कहना चाह रही थीं, यह मेरी समझ से परे था। मेरे दिमाग में एक रील चल रही थी—सुझीत की रील। जब स्कूल में पहली बार हम मिले थे, तब से लेकर तमाम यादें उस रील में एक-एक करके आ रही थीं।

वह दृश्य भी आया, जब छठी कक्षा में बड़े क्लास के बच्चे हमें तंग करने आते थे। तब हमारे बीच नया-नया दाखिला लेकर सुझीत शामिल हुआ था। वह उन बच्चों से भिड़ जाता था और उन्हें मारकर किनारे कर देता था। फिर वह दृश्य आया, जब हमारे घर में सुझीत का निरादर हुआ था। किसी ने उसे अपमानित कर दिया था, और यह बात मुझे बहुत गहरी चोट दे गई थी—क्योंकि मेरे ही घर में मेरे मित्र का निरादर हो गया था।

फिर परीक्षा के समय का दृश्य भी याद आया, जब सातवीं कक्षा में हमारे अध्यापक ने जातिसूचक टिप्पणी की थी। सुखद घटनाएं भी याद आईं। सुझीत फुटबॉल बहुत अच्छा खेलता था। गठीला शरीर, लेकिन कद छोटा था—करीब 5 फुट 2 या 4 इंच।

एक बार हमारे ग्राउंड पर पुलिस की टीम के साथ फुटबॉल मैच हो रहा था। पुलिसवाले उस समय की लीग में खेला करते थे और अपनी लंबाई और ताकत का फायदा उठाकर अक्सर मैच जीत जाते थे। लेकिन उस मैच में यह पांच फुट चार इंच का लड़का, सुझीत, लंबे-चौड़े खिलाड़ियों के बीच खेल रहा था। वह बेहद चपल था और उसने पुलिसवालों को खूब छकाया।

यह मैच लगातार दो-तीन दिनों की बारिश के बाद हो रहा था, मैदान गीला था। एक कोने में पानी जमा हो गया था और कीचड़ फैल गई थी। सुझीत शरारती भी था। एक बार जब वह गेंद लेकर पुलिस के गोल की ओर दौड़ा, तो पुलिसवालों ने गोलपोस्ट को तगड़े खिलाड़ियों से घेर लिया। सुझीत अपनी चपलता से दाहिने कोने की ओर भागा। उसके पीछे दौड़ रहा था पुलिस का एक फुलबैक—लंबा-चौड़ा, करीब 5 फुट 11 या 6 इंच का।

सुझीत ने अचानक ब्रेक लगाया और घुटने मोड़कर झुक गया। पीछे से भागता पुलिसवाला उसकी पीठ से टकरा गया। उसकी दोनों टांगे हवा में और सिर जमीन की ओर, वह कीचड़ में जा गिरा। पूरा मैदान ठहाकों से गूंज उठा। इस छोटे खिलाड़ी ने बड़े पुलिसवाले को अपनी चपलता से चित कर दिया।

हालांकि हम वह मैच हार गए—दो गोल से।

कक्षा में सुझीत गाने भी गाता था। एक बार उसने मेरी नानी को गाना गाकर सुनाया था।

फिर मुझे हमारी आखिरी मुलाकात याद आई। तब मेरा छोटा भाई भी हमारे साथ था। हम प्रदर्शनी देखने गए थे और सुझीत को भी साथ ले लिया था। तीन घंटे तक हमने खूब मनोरंजन किया। हास्य-प्रेमी सुझीत ने कई मजेदार टिप्पणियां कीं। एक बार 40 फीट की ऊंचाई से आदमी नीचे कूद रहा था। उसने टिप्पणी की, "ये नीचे आएगा या ऊपर जाएगा?" यह सुनकर कुछ लोग हंसे, तो कुछ को समझ नहीं आया कि वह क्या कहना चाह रहा है।

फुटबॉल खेलने के दौरान भी वह नंगे पांव खेलता था। एक बार मैंने उसके लिए जूते खरीद दिए थे, लेकिन उसने कभी उन्हें नहीं पहना।

जब स्कूल छोड़ने के कुछ महीनों बाद मैं उसके घर गया, तो उसे जूते देने के लिए पहुंचा। घर की हालत बहुत खराब थी—गंदगी, नालियां, और मक्खियों का जमावड़ा। उसने मुझे रोककर चाय पिलाने की कोशिश की, लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी कि उस माहौल में मुझे चाय पिलाए।

सुझीत ने मुझे मिठा पान खिलाया और बड़ी उदासी से विदा करते हुए कहा, "अगर ज़िंदगी रही, तो जरूर मिलेंगे।"

इसके बाद हमारी मुलाकात सिर्फ एक बार ट्रेन में हुई, जब वह खाना पूछने आया। मैंने उसे देख तो लिया, पर आलस के कारण ठीक से बात नहीं की। यह मौका हाथ से निकल गया।

काश! अगर वह कुछ और पढ़ पाता, तो शायद अच्छी नौकरी मिलती। लेकिन उसके पास सही माहौल और मार्गदर्शन नहीं था। समाज भी उसकी मदद करने में असमर्थ रहा।

गाड़ी धीरे-धीरे बनारस के करीब पहुंच रही थी। खिड़की से सुबह की रोशनी आने लगी थी। माताजी अब भी चेन की बात कर रही थीं—"चेन मिली या नहीं?"

लेकिन सुझीत जैसा इंसान इतनी जल्दी दोबारा नहीं मिलता।


यह पाठ भावुकता और स्मृतियों से भरा है। मैंने वाक्य संरचना और व्याकरण को ठीक करते हुए भावनाओं की गहराई को बनाए रखा है।