Thursday, August 13, 2015

केश विन्यास !

इस बार मेरी अमेरिका यात्रा में एक आयाम और जुड़ गया. वेस्ट विंडसर में भारत के लगभग सभी प्रदेशों के लोग रहने लगे हैं . रहते तो और जगह भी हैं पर यहाँ लोगबाग बहुर्मुखी, अन्तर्मुखी कम और उभयमुखी ज्यादा हैं. ambivert में एक खासियत ये भी होती है कि ऐसे लोग extrovrt और introvert में भी खुलापन ला देने की क्षमता रखते हैं. सीनियर सिटीजन में यह और भी उभर जाता है. जो अमेरिका में 19वीं शताब्दी में काऊबॉय श्रेणी में दिखता था अब वही बुजुर्ग भारतीय आगुन्तकों में दिख रहा है. मसलन पार्क की बेंच पर बैठे उत्तराखंड के आहूजा दूर गुजरते हैदराबादी गोपाल राव को वही से हांक लगाते हैं- “अरे भाई राव ! एक नजर इधर भी.” IIT, खड्गपुर के मैथमेटिक्स के रिटायर्ड प्रोफेसर डा.रॉय सुबह की सैर में इतनी जोर से अपनी आत्मकहानी सुनाते चलते हैं कि घर के अंदर सोये लोगों की नींद खुल जाए. 50 वर्षों का क्लास रूम लेक्चर आवेग तो जाहिर करेगा ही. 82 वर्षीय मूर्तीगारू जब भी हमेशा की तरह टूटे झूले को ठीक करने की बात करते हैं तो लखनऊ के 81 वर्षीय सतीश बाबू उन्हें मीठी झिडकी लगाने से नहीं चूकते. शाम के समय पार्क में हमलोगों की बैठक काफी भरीपूरी हो गयी है. मेरी उम्र उनमें सबसे कम है इसलिए मैं इनलोगों का मैन फ्राइडे हूँ. बेंच ठीक करवाना मेरे जिम्मे है. सबकी कथाएं सुनना मेरा कर्त्तव्य है. अब मेरी उम्र से होड़ लेने कोलकता से दास मोशाय भी आ गए हैं. चूकीं कोलकाता एक “सिटी ऑफ़ जॉय” है और ज्यादातर लोग इस शहर से वाकिफ हैं इसलिए बातें करने का एक और मसला मिल गया है. आजकल 12 में से 6 जन तो जुट ही जाते हैं. वहां आने, बैठने और गुजरने वाले अमेरिकन, चाईनीस, जेपनीस, कोरियाई, पाकिस्तानी और मेक्सिकन  अचम्भे से कम और स्नेह ज्यादा देखने लगें हैं. ऐसा खुलापन, बैठकर समय गुजारने का समय और मिलनसारिता भला अब कहाँ देखने को मिलती है. हमलोग किसी भी मसले पर बातें कर लेते हैं.

दिखने में सबसे वयोवृद्ध, छड़ी का सहारा लेते हुए भी हवा के तेज झोकों से सिहरते, माननीय मुरली कृष्ण जी तेलगू और इंग्लिश बोलते हैं. दिल और फेफड़े की बिमारी के बावजूद सदैव मुस्कुराते दीखते हैं. हमलोगों सभी को उन्होंने याद रखने के लिए नया नाम दिया है, जैसे मुझ रांची निवासी को उन्होंने स्वर्णरेखा नाम दिया है. कल ही उन्होंने आध्यात्मिकता को खूबसूरत शीर्ष दिया. डा. रॉय के पूछने पर कि क्यों अच्छे लोग ही सताए जातें हैं उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया-“We are all guest on this earth.” अभीतक मैंने “ जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये “ ही जाना था.
ऐसा नहीं कि मात्र प्रबुद्ध बातें ही होती हैं. कुछ दिन पहले तक सबके सर के बाल बढे हुए थे. तभी मैं हजामत-याफ्ता वहां पहुँच गया. आहूजा पूछ ही बैठे कि मैंने हजामत कहाँ बनवाई. इधर हजामत बनवाना भी एक जहमत है. एक्सप्लोसन तब हुआ जब उन्हें पता चला कि ये कलाकृति इन-हाउस थी. मुझे हंसी भी आ गयी बताने में. शुरूआती कोशिश मैंने खुद की. बिगड़ गया. पत्नी सवारने आयीं और बिगड़ गया. आखिरकार मेरे दामाद ने मामला सम्हाला. सब मिलजुला कर, किसी को शक नहीं होता था कि मैं सैलून नहीं गया था. अहुजा ने तुरत तुप्पा कसा- “आपको तीन फायदे और एक नुकसान हुआ. पैसा बचा. समय बचा, दूर कार से लिवाजाने के लिए किसी की सिफारिश नहीं करनी पड़ी पर कोमल उँगलियों का सर पर थिरकना गवां बैठे”. एक जोरदार ठहाका तो बनता ही था. कभी-कभी बच्चे शोरगुल भूलकर हमलोगों की तरफ देखने लगते हैं.
पूरे हफ्ते, डा. रॉय अपने बेटे से नाराज रहे. सतीश बाबू के बेटे ने तो यहाँ तक कह दिया कि अब इस उम्र में इतनी जल्दी-जल्दी हजामत बनाने की क्या जरूरत आन पड़ी. 
इस सोमवार सभी की हजामत बनी हुई थी. पर सबसे ज्यादे उखड़े हुए आहूजा जी थे. एक बार भी स्पर्श नहीं हुआ. सबकुछ मशीन से. उसपर तुर्रा यह कि कम्युनिकेशन गैप. इन्हें वैसी इंग्लिश बोलना नहीं आती थी जो वो समझ सके और उसका एक्सेंट इनके पल्ले नहीं पड़ता था. इंटरप्रेटर गैरमौजूद. आस-पड़ोस में फिरंगी और लड़का बाहर किसी दूसरे काम में मशगूल.
अब आहूजा जी इंडिया जाकर ही हजामत बनवायेंगे. उनका बार्बर कम से कम 10 मिनट सर की मालिश करता है. अब तो वह T20 खेलों पर भी बोलने लग गया है. पोलिटिकल इतना कि किसी का भी सर चकरा जाये. इस समय वह लोगों को वह बता रहा होगा जिसपर शायद ही किसी का ध्यान गया हो. वह यह कि सुषमा स्वराज की फजीहत के पीछे नरेन्द्र मोदी का हाथ है. वह भी पूरे सबूतों की साथ. जब राजनीति का वेत्ता कोई भी आम आदमी आज के दिन सैलून के बाहर निकलता होगा तो सबको बड़े कॉन्फिडेंस के साथ यह खुलासा बताता होगा वह भी जरूरत से ज्यादा सबूतों के साथ. गए जमाने में तो रामायण और महाभारत की शुरुआत कुछ ऐसे ही हुई होगी. और कुछ नहीं तो अकबर महान की महानता में उसका भी कुछ तो हाथ रहता होगा जिसके सामने सबका सर झुक जाता है. अब आप ही बताएं सबसे बड़ा उभयमुखी कौन है ? क्या वह जो सर की हजामत के साथ-साथ दिमाग की भी हजामत कर देता है ? क्या कभी हमलोगों ने रंग-बिरंगे आसमान, पेड़-पौधों, जानवरों अथवा संक्षेप में प्रकृति के केश-विन्यास को निरखा है ? क्या कभी हमलोगों ने अपने-अपने भगवानों का हेयर स्टाइल गौर किया है ?


Monday, May 18, 2015

स्ट्रेस बस्टर !

मेरी उम्र १३ वर्ष थी जब मैंने स्कूल पास किया. कॉलेज में भी मेरा बचपना बहुत दिनों तक मेरे साथ रहा. अपनी कॉलोनी में हमलोग सरस्वती पूजा करते थे. चन्दा बटोरना, प्रतिमा स्थापित कर पूजा से ज्यादा धूमधाम मचाना और विसर्जन के बाद सार्वजनिक भोज का आनंद उठाना कुछ ऐसे क्षण होते थे जो पुनः अगली बसंत पंचमी की बाँट जोहाते रहते थे.
सार्वजनिक भोज का सारा इंतजाम झा अंकल के घर होता था. एक बार, जब झा आंटी पूरी का आटा गूंथ रही थीं तो मैंने उनका सहयोग किया. उनकी ख़ुशी देखकर मैंने पूरियां भी बेली और कुछ तलकर निकाली भी. भोज में सबसे ज्यादा बार खीर मुझे मिली. उससे दिन मुझे यह भान हुआ कि थोड़ी सी मदद किसी को कितना विभोर कर देती है. अगले दिन कॉलेज जाते समय मैंने माँ को कहा कि नेरे लिए वह एक मोटा पराठा या रोटी भर बनाकर रख दे जिसे मैं सब्जी या मात्र गुड के साथ खा लूँगा. माँ जिसे दर्जन भर लोगों के लिए नाश्ता और खाना बनाना पड़ता था बहुत खुश हुई. अगले दिन और फिर बहुत दिनों तक मुझे पराठा या देसी घी से भींगी रोटी मिलती रही आशीष के साथ. मैं भी जब-तब चौके में माँ के काम में हाथ बटाता रहता था. बाद में यह सिलसिला मैंने भाभी के साथ भी जारी रखा. एक दिन मेरे बड़े भाई ने प्यार से डांटकर मुझे चौके से निकाला, कहा- प्रकाश प्रोटोकॉल बिगाड़ रहा है . आयेदिन मुझे सहयोग न देने के कारण उलाहना मिलता है. मुझे अपने भाईयों, रिश्तेदारों और और यहाँ तक कि दोस्तों से भी झिढ़कियां मिलती रही. पर खाना बनाने और खिलाने का आनंद मैं ताउम्र उठाता रहा.
आज सभी को किचेन में देखा जा सकता है. मजबूरन, जिनकी बीबी अब नहीं हैं या बीमार रहती हैं या खाना बनाते-बनाते ऊब चुकी हैं. शौकिया, जिन्हें वैसा कुछ खाने-खिलाने का शौक है जैसा वे चाहते हैं नयी पीढ़ी के लिए तो यह अनिवार्यता हो गयी है क्योंकि अब मिया-बीबी दोनों नौकरीयाफ्ता हैं.

मेरे एक मित्र एक दिन परेशान से मेरे घर आये. परेशानी से ज्यादा वे परेशानी में डूबने-उतराने से परेशान थे. मैंने उनके लिए बिरियानी बनायी. खाते समय मैंने उन्हें बताया कि किताबे पढने, टीवी देखने से ज्यादा आनंददायक और कामगर स्ट्रेस बस्टर खाना बनाने की व्यस्तता है. 

Saturday, May 2, 2015

These Little Children !

I like the 21st.century, the accelerated technological explosion, the present generation and above all the infants and the toddlers. Stephen Hawking has rightly said, It is clear that we are just an advanced breed of monkeys…..” The fact is that this children galaxy is more advanced than us. Their advancement is in logarithmic progression.
I find my one year maternal granddaughter fondling with the smart phone. She at least knows for sure that touching screen would make the Utube video disappear. She manages her soother while sleeping so that it behaves to her desire.
My two year old grandson has a way of his own. One day, his dad was showing him some video on the desk top. He was holding his son’s hand to refrain him from handling the mouse or the keyboard. But he was unaware that his child was using his toes to adjust bass/treble and volume on the console underneath the table.
One afternoon both father and son went for a short nap. After one hour, I went to their room. I found the child staring at the roof while his father was asleep. When I entered the room, the child put his forefinger on his lips and cautioned me to not to make any noise lest his father’s sleep would be disturbed.
Such a scenario development would certainly expect something more surprising from a five year old. My maternal grandson Sai was denied his choice toy. While returning from the mall, Sai sitting in the back seat asked me if I had a piece of rope. When I asked the reason, he said that he would love to see his dad’s hands tied with the rope. My son-in-law was aghast. After a little while, Sai asked- “Dad! What is your age?” Dad replied that he was 35.
Sai then asked- “Dad! When I would be of your age then would I have a son of my age?”
Dad replied in affirmative and asked the reason to think about so distant a future.
Sai replied- “When I would have a son of my age I shall never ever deny him a toy of his asking.”



Monday, April 27, 2015

एक और बावर्ची !

हम पांच बच्चों के पास कुल पांच आने (आज का पच्चीस पैसा) थे । पिकनिक के बारे में हमलोग बहुत सुनते थे । एक दिन मौका मिल ही गया । चौराहे के बनिए ने सूजी, चीनी और देसी घी थमाते हुए सुझाया - कुम्हरार चले जाओ पिकनिक करने ।
वहां टूटे अशोक स्तम्भ की छाया में, सूखे पत्तों की आग में हमलोगों ने लपसीनुमा हलवा बनाया और खाया भी।
नियमित खाना बनाने का बीजमंत्र बाबूजी ने दिया । नौकरी लगने के बाद जब अकेले रहने की नौबत आयी तब उन्होंने कहा - स्वस्थ रहना है तो खुद खाना बनाना ।और कैटेलिटिक सहायता हमलोगों के सीनियर सतीश मित्तल मेहरोत्रा ने दी । वे मुझे और मेरे हमउम्र बैचलर आर्य समायजुला लक्ष्मण राओ को छुट्टियों के दिन घर पर कुकिंग सिखाने आ जाया करते थे । मैंने ताउम्र सेलिब्रेशन के मौकों पर ही होटल का खाना खाया ।
शायद आखिरी हथौड़ा फ़िल्म "बावर्ची" ने लगाया । नायक को खाना बनाकर खिलाने में बेइंतिहा आनंद मिलता था । इसके एक डायलाग ने मेरे जीवन में कुछ बदलाव तो अवश्य लाया - "किसी बड़ी ख़ुशी के इंतज़ार में हम ये छोटी छोटी खुशियों के मौके खो देते हैं."
शादी के बाद भी मैं अपनी श्रीमती को आराम देने की खातिर ज्यादातर जब घर में मेहमान आते थे किचन में सहयोग देने घुस जाया करता । इस प्रवृति को धक्का तब लगा जब उन्होंने मेरे दोस्त से मेरे सामने शिकायत की कि मैं उन्हें लज्जित करने के लिए ऐसा करता हूँ । यह अवधारणा तब ख़त्म हुई जब वे काफी दिनों के लिये बिमारे-बिस्तर हो गयीं ।
लोगबाग मेरे बनाये खाने की फ़रमाईश करने लगे । मैं चाहे जैसा भी खाना बनाऊं लोग तारीफ़ ही करते । मुझे लगता वैसा ही जैसा मित्र की कविताओं की ।
बहुत  दिनों तक तो मुझे लगा कि मुझे बेबकूफ़  बनाया जा रहा है । मेहमान जिनके पास निगलने के सिवा कोई चारा न रहता है, लोगबाग जिन्हें मुझसे पार्टी लेनी है और  उनकी औरतें जो बेगारी से निजात चाहती हैं ।
मुझे ज्यादा लोगों के लिए भोजन बनाना बहुत बाद में आया । अब तो मेरी बनायी नॉन वेज बिरयानी कभी-कभी मुझे भी लाजवाब कर देती है ।आनंद तब आता है जब घर के अंदर पैर रखते ही लोग फ़ैली खुशबू की तारीफ़ करने लगते है और जब पूरी बिरयानी सफाचट हो जाती है । इसके सिवा मेरे पास और दूसरी कसौटी भी तो नहीं है ।
मैं  बरसों से गंधहीनता(Anosmia) और  कुछ हद तक स्वादहीनता(olfactory) से ग्रसित हूँ ।

Tuesday, April 14, 2015

वह रिक्शावाला !

पिछले वर्ष शायद इसी मौसम में मैं सुबह की सैर से मंदिर होकर वापस लौट रहा था. तभी पीछे से किसी बच्ची की आवाज सुनाई पड़ी. वह पूछ रही थी – अंकल ! प्रेसिडेंट में एस होता है ना ! और अंकल ने जवाब दिया – "हां बेटे ! It is P R E S I D E N T .  PRECEDENT में C होता है, जिसका मतलब “मिसाल” होता है." लगता था अंकल और बच्ची किसी रिक्शे पर आ रहे थे. पर ये क्या ? जब रिक्शा बगल से गुजरी तो रिक्शे पर 7-8 वर्ष की दो बच्चियां बैठीं थीं. अंकल कोई और नहीं वह रिक्शा वाला ही था. अंग्रेजी की इतनी समझ साफ़ बता रही थी कि वह काफी पढ़ा-लिखा था. वह बच्चियों को स्कूल पहुंचाने ले जा रहा था. इसके बाद दो-तीन बार उनलोगों से भेंट हुई पर दूरी इतनी थी कि उनलोगों के मध्य बातों का विषय और माध्यम क्या था पता नहीं लग पाता था.
आज वह रिक्शावाला सामने से आता दिख ही गया. वही दो लडकियां बैठी थीं. इतनी सुबह, वह भी चेहरे पर मुस्कुराहट लिए इस ढलती उम्र में मानों मेरी तरह सुबह की सैर में निकला हो. एकदम ऐसा लग रहा था कि उसके पैर पैडल को लयबद्ध गोल घुमा रहे थे. कद-काठी और पहनावा किसी आम रिक्शेवाले की तरह, चेहरा भी धुप में झुलसा हुआ लंबा तिकोना पर आँख में गजब की चमक थी. वह 65 के आस-पास का लग रहा था. रिक्शा चलाने वाले अपनी उम्र से 10 वर्ष ज्यादा के ही दीखते हैं. इच्छा तो हुई कि उसे रोककर उसके बारे में और जानें पर सोचने में जितना वक्त गुजरा उसमें वह बहुत आगे निकल गया. मैं भी उसी दिशा में बढ़ गया जिधर वह रिक्शा वाला गया था. कोई 100 मीटर चलने के बाद बाईं तरफ मोड़ पर स्कूल बस स्टैंड पर खड़ी दिखी. लड़कियों को उतार कर वह वही रिक्शे पर आराम से बैठ गया. वह जरूर उनकों बस पर चढाने के बाद ही वहां से जाएगा. 

एक दिन फिर दिखा. रिक्शे पर बैठे एक वृद्ध के लिए सब्जियां खरीद रहा था. सावले, तिकोने, लम्बे चेहरे पर बढ़ी हुई दाढ़ी उसका मजहब बता रही थी. पर संतोष भरे चेहरे पर चमकती आँखे बहुत कुछ और भी बता रही थी.
2-3 महीने की उत्सुकता भरी जानकारी जो इक्कठी हुई वह इस प्रकार है.
वह वृद्ध मुसलमान रिक्शेवाला कभी बुक-बाईंडिंग का काम करता था. वहीं किताबों के ढेर ने उसे पढ़ा लिखा कर सयाना किया. शायद थोडा ज्यादा और बहुत ठीक तरह से.
बाल-बच्चों को बसाने और औरत के इंतकाल के बाद वह अकेले बहुत दूर किसी भी अनजान आशियाने की खोज में निकल पडा. सबसे मुफीद जगह उसको यही मदरसे और मस्जिद की पिछली दीवारों से सटी एक 8/8 की खोली में मिली. बस सुबह ज़िंदा रहने भर के लिए कमा लिया करता. तबियत पसंद समय तक सुबह के समय की रिक्शा चालन उसके स्वास्थ्य को ठीक रखती. बाकी समय वह किताबों और रद्दी अखबारों में उलझा रहता. कहने की आवश्यकता नहीं है कि उसका सुफिआना अंदाज जाहिर कर रहा था कि ज्यादातर जहीन पढाई ही करता होगा.
खोली के बाहर जरूरत पड़ने पर ही चुल्हा जलता था. ज्यादातर उसके भोजन का इन्तजाम उसके सवारीवाले कर दिया करते थे. रिक्शा वह सुबह ही चलाता था जिससे उसकी जरूरत पूरी हो जाती थी. हाँ वह कुछ पैसे बैंक मे जोड़ता रहता था जिसका कारण वह नहीं बता पाया. उसने बड़ी मासूमियत से मुस्कुराते हुए कहा कि उसके जानकार और मदरसे वाले उसके कफ़न का इन्तजाम कर देंगे.
इस तरह का चरित्र मुझे सॉमरसेट मॉम के "रेजर'स एज" में दिखा था. नायक लैरी सबकुछ आजमाने के बाद टैक्सी चलाने लगता है. हर समय नए लोग, नयी जगह; जुड़ पाने की कोई संभावना नहीं.
और बाद में आयन रैंड  के "फाउंटेनहेड" में दिखा था. आर्किटेक्ट नायक रोर्क कोयले की खदान में मशक्कत करने चला जाता है. 

पुनःश्च 12.09। 2025  :  

आज जब मैं 10:00 बजे सुबह व्हीलचेयर पर घूमने निकला तो मुझे वही रिक्शावाला 10 वर्ष बाद एक गुलमोहर के पेड़ के नीचे बैठा दिखा। वैसा ही शांत चेहरा और तीखी नजरें। मैंने तो उसे तुरंत पहचान लिया पर वह उसे काफी देर लगी वह भी तब जब मैं उसे 10 वर्ष पहले की बातें याद दिलाई । उसने ज्यादा उम्र के कारण रिक्शा चलाना कब का छोड़ दिया था । उसने पास ही एक छोटा सा घर बना लिया था।  उसका एक बड़ा बेटा फौज से रिटायर होने के बाद उसे खोज ही निकाला। उसका बेटा अब एक सिक्योरिटी एजेंसी में काम करता है । वह अपने बच्चों के साथ अपने अब्बू के पास ही रहता है। अब इरफान सुबह की सैर के बाद कोई मुफीद जगह देख कर थोड़ी देर आराम कर  अपने घर लौटता है। 



Friday, February 27, 2015

सादगी !

कोई कितना भी पैसेवाला हो, अमीर हो, वह बड़ा तो हो सकता है पर महान नहीं. महात्मा गाँधी की महानता उनकी सादगी में निहित थी. मैं बहुत पहले श्री जहांगीर रतनजी दादाभोई टाटा का टीवी पर इंटरव्यू देख रहा था. उनसे प्रश्न पूछा गया- "आपको तो रफ्तारों का बाजीगर कहा जाता है. देश में पहली हवाई उड़ान का श्रेय भी आपही को जाता है. आज भी इस उम्र में आप अपनी कार खुद ही ड्राइव करते हैं. अगर कोई आपको ओवरटेक करना चाहता है तो क्या आपको क्रोध नहीं आता है." टाटा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया- "नहीं ! अच्छा लगता  है जोश देखकर. मैं तुरत उसे आगे बढ़ने की जगह दे देता हूँ." जब उनसे पूछा गया- " आप तो अपने पांच सितारा होटल ताज के सुइट में अकेले रहते  हैं. आप तो तरह-तरह की नायाब खाने का लुत्फ़ उठाते होगें." उनका जवाब था- " मैं अरसे से उबले हुए आंटे की दो रोटी और उसके साथ कोई भी उबली सब्जी और बदलाव के साथ कुछ सलाद ही स्वाद लेकर खाता हूँ." शायद और कोई बोलता होता तो मुझे शक भी होता पर उनके बोलने में जो शालीनता और सादगी थी उसने उसकी कोई गुंजाईश छोड़ी ही नहीं.
दिवंगत श्री तीरख राम गुप्ता का ब्यौरा इन्टरनेट पर खोजने पर भी नहीं मिलता है. पर उषा ग्रुप से भला कौन नहीं परिचित होगा. इस साम्राज्य की नीव और उसके व्यापार को इन्होने ही सवारा था. नेहरु जी ने इन्हें अपने चहेते हैवी इंजीनियरिंग कारपोरेशन, रांची को ट्रैक पर लाने के लिए इन्हें ही 1965 में चेयरमैन बनाकर भेजा था. मेरे पिताजी बिहार सरकार की तरफ से डेपुटेशन पर सेक्रेटरी के पद पर कार्यरत थे. पिताजी अपनी सेहत के कारण घर की बनी चार पतली रोटियाँ और उबली हुई सब्जी ले जाते थे लंच के लिए. बाद में छः ले जाने लगे. मालूम हुआ चेयरमैन गुप्ताजी जब भी हेडक्वार्टर में रहते, लंच शेयर करने पिताजी के कमरे में आ जाया करते.
1969 के आस-पास,एक बार, पिताजी बोर्ड की मीटिंग में शामिल होने दिल्ली जा रहे थे. इंडियन एयरलाइन्स का पंखों वाला फोक्कर फ्रेंडशिप हवाई जहाज कलकत्ता से रांची, पटना, लखनऊ होते हुए दिल्ली जाता था. 50  यात्रियों का  यह प्लेन  शायद सप्ताह में 3 उड़ान  लेता था । नहीं याद है कि उस चार-पांच घंटे की फ्लाइट में लंच दिया जाता था या नहीं पर पिताजी अपना भोजन अपने साथ ले जाते थे. प्लेन में खिड़की वाली सीट पर पहले से कोई 70 के आस-पास के बुजुर्ग बैठे हुए थे. वे अस्वस्थ तो नहीं दिख रहे थे पर एयर होस्टेस उनका कुछ ज्यादा ही ख्याल रख रही थी. शायद और कोई तकलीफ हो. देखने से कोई पढ़े-लिखे भले व्यापारी लगते थे. रास्ते भर वे अपनी फाइल के पन्नों में उलझे रहे. पिताजी को यह समझ में नहीं आ रहा था कि उन सुइट-टाई पहने महानुभाव को खिड़की वाली सीट लेने की क्या जरूरत थी. पिताजी ठीक एक बजे दिन में अपना भोजन कर लेते थे पर बगल वाली सीट के सामने लंच का डिब्बा खोलने में संकोच हो रहा था वह भी सूखी रोटियों वाला. उन महानुभाव को शायद इसका भान हो गया या फिर वह भी इसी समय लंच लिया करते थे. उन्होंने पैर के पास पड़े बैग से सुन्दर सा लंच का डब्बा निकाला और उसे खोला. अरे ! उसमें भी ठीक उसी शक्ल की रोटी और सब्जिया. सारा संकोच खत्म हो गया. उन महानुभाव ने उसके बाद कोई दस मिनट पिता जी से उनके बारे में और कंपनी की सेहत के बारे में बातें की और फिर वे अपनी फाइल में उलझ गए. दिल्ली आ गया. पिताजी से हाथ मिलाकर वे बुजुर्ग तेजी से उठकर दरवाजे की तरफ लपके. एयर होस्टेस ने भी उनकी आगवानी कर उनका उतरना सहज बना दिया. पिताजी ने उन महानुभाव का नाम तक नहीं जाना था. दरवाजे से बाहर निकलते वक्त उन्होंने होस्टेस से पूछा कि क्या वह उन्हें जानती है.
वह बुजुर्ग और कोई नहीं श्री घनश्याम दास बिरला थे .
  

Monday, March 3, 2014

आत्मदर्शन !

28 वर्षों की नौकरी के दरम्यान मैं इतना व्यस्त था कि मुझे वर्क-अल्कोहोलिक कहा जाने लगा. तभी 1997 में, मुझे सस्पेंशन आर्डर मिला. प्रतिकूल अवस्थाएं, मनुष्य को अनुकूल बना देती हैं. 6 महीने बाद जब मुझे पुनर्स्थापित किया गया तो मुझमें काफी बदलाव आ गया था.

मुझे अवसर मिला और मैं बदरीनाथ-ऋषिकेश होता हुआ वाराणसी आ गया. सुबह-सबेरे अस्सी घाट पर स्नान-ध्यान कर संकट मोचन मंदिर पंहुच गया. उस दिन मंगलवार भी था. मुझे अभी तक याद है कि दर्शन भली-भांति हो इसलिए सामने के कुंएं की मुंडेर पर और लोगों के साथ खड़ा होकर तन्मय होकर हनुमान चालीसा का पाठ किया. उसके बाद श्री रामचंद्र के दर्शन को उनके गर्भ-स्थल गया. श्री रामचंद्र दयालु ... का भाव-विभोर होकर स्तुति की. उसके बाद इच्छा हुई उनकी पांच बार परिक्रमा करने की. पीछे कोने में, अँधेरे में, एक वयोवृद्ध दिखे, उम्र अस्सी की आस-पास, कद छ फीट से ज्यादा, लंबे-लंबे हाथ पैर. वे एक पैर पर दूसरा पैर चढ़ा कर लगता था घंटो से ध्यान की मुद्रा मैं बैठे हुए थे. अंतिम चक्र के समय मुझसे रहा न गया. मैंने उनके पाँव छू लिए. उन्होंने अपने पाँव ऐसे समेटे जैसे उन्हें करंट लग गया हो. पर साथ में उन्होंने आशीर्वाद की मुद्रा मैं हाथ भी उठाये. मैं स्वयं अपने इस कृत्य से इतना घबडा गया कि बिना पीछे देखे मंदिर से बाहर आ गया. बनारस से लौटते ही मुझे पदोन्नति मिली जिसकी मुझे शून्य प्रतिशत भी आशा नहीं थी. तबसे, मैं सदैव उन महात्मा को अपने स्मरण में बसाए रखा.

1999 जून में, मैं अपनी दोनों बेटियों को लेकर पुणे गया सिम्बियोसिस में दाखिले के लिए. दिक्कतें पेश आ रही थीं. सबसे भयानक दिक्कत तो यह थी कि मेरी लड़की ने सैकड़ों विकल्प होते हुए भी केवल सिम्बियोसिस का ही फॉर्म भरा था. उसके पूरे वर्ष के बर्बाद होने की स्थिति थी. तीसरे दिन, किसी सज्जन ने मुझसे कहा कि एक बार शिरडी साईं बाबा के दर्शन तो कर लीजिए इन्तजार के घड़ियों की उकताहट-घबराहट तो कम हो ही जायेगी घूमने से.
एक धार्मिक स्थल की जैसी छवि मेरे मन में थी वह जगह बिल्कुल वैसी ही थी. कोई दिखावा नहीं, पढ़े-लिखे महानुभाव, जज, डॉक्टर, इंजिनियर, प्रशासक आदि श्रद्धालुओं का मार्ग दर्शन करते हुए, देश-विदेश के जाने-माने कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते हुए, साधू-संत सायंकाल की बेला में प्रवचन करते हुए, सभी धर्म-सम्प्रदाय के जन मेरी तरह विचरते हुए,
ठहरने के स्थानों मे और घरों में बिना दरवाजों का प्रविष्ट द्वार, मात्र दो रुपये में असीमित भोजन प्रसाद, नीम का हरा-भरा पेड जिसकी पत्तियां तक मीठी, एक ही प्रांगण में मंदिर, समाधि एवं मजारें भी और सबसे संतोषजनक न कोई मुल्ला और न कोई पंडित. मेरे जैसे नास्तिक को शायद कोई ठौर मिलता प्रतीत हो रहा था. मैंने कहीं पढ़ा था कि नास्तिकता भी आस्तिकता की एक श्रेणी है. नास्तिक अपना ज्यादा वक्त अपने भगवान को खोजने में ही लगा देता है.
भोजन प्रसाद लेकर जब मैं बाहर निकल रहा था तो समाधि-स्थल द्वार पर खड़े संतरी ने हमलोगों को अंदर जाकर रात्रि-आरती में सम्मलित होने को कहा. इस बार मैंने साईं बाबा को बहुत गौर से देखा. मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि क्या इन्हें ही मैंने संकट मोचन में देखा था.
वहाँ मैंने भोजन करना सीखा. मेरे दायीं तरफ सफेद वस्त्रों में एक वृद्ध साधू भोजन प्रसाद ले रहा था. एक बार सामने जितना परोसा गया उतने से ही उसने संतोष किया दुबारे लिया नहीं. साथ ही बची दो बड़ी रोटियों को और मिठाई के टुकड़े को उसने अपने थैले में डाल लिया. जिसे उसने बाहर सड़क पर आकर एक भिखारी को दे दिया. आगे जाकर एक मिठाई भी थैले से निकाल कर एक कुत्ते को अपने हाथों से खिलाई.
जब मैं पुणे लौट कर आया, तो मेरी बेटी का दाखिला बड़ी आसानी से हो गया साथ ही मुझे उसके रहने के लिए एक बिल्कुल मेरी रहन-सहन और संस्कार जैसे या उससे भी अच्छे प्रोफेसर के घर में पांच अन्य सिम्बियोसिस में पढ़ने वाली लड़कियों के साथ जगह मिल गयी. मेरे वंश से शायद मेरी लडकियां ही प्रथम थी जिन्होंने घर से बहुत दूर रहकर पढ़ने की हिम्मत दिखाई.
उसके बाद मेरे तीनों बच्चों की ग्रेजुएशन से आगे की पढाई और नौकरी पुणे मे ही हुई जिससे मुझे हर बार शिरडी जाकर साईंबाबा के दर्शन का भरपूर सौभाग्य प्राप्त हुआ.
अब लड़कियों का विवाह करना था पर उसके लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे. इसलिए मैंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का मन बनाया पर मैनेजमेंट मुझे प्रोन्नति और सामान्य सेवानिवृत्ति के बाद सेवा विस्तार का लालच देने लगी. इन सब उपचारों से मुझे एक मुश्त 20-25 लाख मिलने वाले नहीं थे. जब एक वर्ष तक,बात बनते नहीं दिखी तो मैंने शिरडी जाकर हाथ जोड़े. लौटते समय, ट्रेन में, अपने प्रांत की सीमा लांघते ही मैंने समाचार पत्र में मेरे पक्ष में मैनेजमेंट की सहमति पढ़ी. यह भी आकस्मिक नहीं हुआ कि मेरे दोनों दामाद और मेरी बहू और उन सभी के माता-पिता-परिवार भी साईं भक्त ही हैं.
कुछ वर्ष पहले, मेरी माँ के श्राद्ध क्रिया के खत्म होते ही मुझे आई०सी०सी०यू में बहुत ही बिगड़ी अवस्था में दाखिल कराया गया.लगातार आक्सीजन दिया जाता रहा. जब भी मैं मूर्छा की अवस्था में आता , मुझे दिखता कि सात-आठ फूट लंबे साईं बाबा गेरुए वस्त्र में अपनी गोद में मेरा सर रखकर सहला रहे है.  मेरे स्वास्थ्य-लाभ पर मेरे डॉक्टर भी आश्चर्यचकित थे. उन्हें जब कोई कारण न दिखा तो मेरी श्रीमती की तुलना सती सावित्री से कर डाली.
उसके एक वर्ष बाद मुझे ह्रदय-घात हुआ. एंजियोप्लास्टी हुई.इस बार न मैं और न मेरी श्रीमती तनिक भी विचलित हुईं. चार महीने बाद जब मैं पुणे के जहांगीर हार्ट अस्पताल में अपनी गहरी जांच के लिए गया तो मेरे बेटे ने स्वतः साईं दर्शन ले जाने की इच्छा दिखाई.
दिवाली की सुबह जब बहुत भीड़ की आशंका से हमलोग तड़के सुबह मंदिर द्वार पर पहुंचे तब मेरे पाकेट में मेरा सेल रह गया था. मेरा लड़का उसे जमा करने गया पर उसने भली-भांति दर्शन हो पाने में आशंका जताई. जैसे ही हमारी कतार दरवाजे तक पहुंची, हमलोगों को भीड़ नियंत्रित करने की खातिर रोक दिया गया. आधे घंटे की प्रतीक्षा के बाद जब दरवाजा खुला तो हमलोगों ने पूरी आरती पहली कतार में खड़े होकर देखी. मैं तबतक 25-30 बार दर्शन को आ चुका था पर ऐसा दर्शन पहली बार हुआ था.
इन १५ वर्षों में पूरे शिरडी में मुंबई की धमक और बालीवुड की चमक ने लगभग सम्पूर्ण बदलाव सा ला दिया है. स्वयं
साईं बाबा को आभूषणों के बोझ ने दबा रखा है. गाँव की भीनी सुगंध और ऐतहासिक शिरडी कहीं खो सा गया है. पर क्या साईं की नजर में कोई भी अन्तर आया है ?  एक अजीब अनुभव होता है हरेक बार. मैं जिस मनःस्थिति से उनके समक्ष पहुँचता हूँ, उनकी आँखों में वैसा ही भाव  देखता हूँ, प्यार भरा, रोष भरा, चिंतित, गंभीर, मुस्कुराता हुआ, शान्त और कभी ऊपर की तरफ वैराग्य से देखता हुआ.
भारतवर्ष की १२५ करोड आबादी ३५ लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फ़ैली है. प्रत्येक १००० वर्ग पर रहन-सहन व भाषा बदल जाती है. यहाँ हजारों जातियां बसती हैं. धर्म और संप्रदाय सैकड़ों की संख्या में कुतर्क और लड़-झगड रहे हैं. ऐसी विविधता में मात्र साईं बाबा का चरित्र ही सूर्य के प्रकाश की तरह सबको प्रकाशित करता रहता है.
गीता में यह कई बार कहा गया है कि स्थितप्रज्ञ की अवस्था प्राप्त करने के लिए श्रद्धा और धैर्य के अभ्यास से आरभ करना चाहिए. यही साईं प्रांगण में सब जगह लिखा मिलेगा. आप पहली बार जब साईं दर्शन को जाएँ तो प्रसन्न मन से जाएँ. अगर दुखी मन से, बहुत सारी चिंताएं लेकर पहुंचेंगे तो साईं बाबा के सामने आने पर बरबस सुबकने लगेंगे.

मैं गुरु, भगवान, ईश्वर, अवतार इत्यादि की परिभाषा में नहीं उलझना चाहता. बचपन से सुख-दुःख में किसी के पास, कहीं तो जाने की आदत सी पड़ गयी है. जिनसे स्नेह मिलता है, उन्हें स्नेह देने का प्रयत्न करता हूँ.