इस बार मेरी अमेरिका यात्रा में एक आयाम और जुड़ गया. वेस्ट विंडसर में भारत के
लगभग सभी प्रदेशों के लोग रहने लगे हैं . रहते तो और जगह भी हैं पर यहाँ लोगबाग
बहुर्मुखी, अन्तर्मुखी कम और उभयमुखी ज्यादा हैं. ambivert में एक खासियत ये भी
होती है कि ऐसे लोग extrovrt और introvert में भी खुलापन ला देने की क्षमता रखते
हैं. सीनियर सिटीजन में यह और भी उभर जाता है. जो अमेरिका में 19वीं शताब्दी में काऊबॉय
श्रेणी में दिखता था अब वही बुजुर्ग भारतीय आगुन्तकों में दिख रहा है. मसलन पार्क
की बेंच पर बैठे उत्तराखंड के आहूजा दूर गुजरते हैदराबादी गोपाल राव को वही से
हांक लगाते हैं- “अरे भाई राव ! एक नजर इधर भी.” IIT, खड्गपुर के मैथमेटिक्स के रिटायर्ड
प्रोफेसर डा.रॉय सुबह की सैर में इतनी जोर से अपनी आत्मकहानी सुनाते चलते हैं कि
घर के अंदर सोये लोगों की नींद खुल जाए. 50 वर्षों का क्लास रूम लेक्चर आवेग तो जाहिर करेगा ही. 82 वर्षीय मूर्तीगारू जब भी हमेशा की तरह
टूटे झूले को ठीक करने की बात करते हैं तो लखनऊ के 81 वर्षीय सतीश बाबू उन्हें
मीठी झिडकी लगाने से नहीं चूकते. शाम के समय पार्क में हमलोगों की बैठक काफी
भरीपूरी हो गयी है. मेरी उम्र उनमें सबसे कम है इसलिए मैं इनलोगों का मैन फ्राइडे
हूँ. बेंच ठीक करवाना मेरे जिम्मे है. सबकी कथाएं सुनना मेरा कर्त्तव्य है. अब
मेरी उम्र से होड़ लेने कोलकता से दास मोशाय भी आ गए हैं. चूकीं कोलकाता एक “सिटी
ऑफ़ जॉय” है और ज्यादातर लोग इस शहर से वाकिफ हैं इसलिए बातें करने का एक और मसला
मिल गया है. आजकल 12 में से 6 जन तो जुट ही जाते हैं. वहां आने, बैठने और गुजरने
वाले अमेरिकन, चाईनीस, जेपनीस, कोरियाई, पाकिस्तानी और मेक्सिकन अचम्भे से कम और स्नेह ज्यादा देखने लगें हैं.
ऐसा खुलापन, बैठकर समय गुजारने का समय और मिलनसारिता भला अब कहाँ देखने को मिलती
है. हमलोग किसी भी मसले पर बातें कर लेते हैं.
दिखने में सबसे वयोवृद्ध, छड़ी का सहारा लेते हुए भी हवा के तेज झोकों से
सिहरते, माननीय मुरली कृष्ण जी तेलगू और इंग्लिश बोलते हैं. दिल और फेफड़े की
बिमारी के बावजूद सदैव मुस्कुराते दीखते हैं. हमलोगों सभी को उन्होंने याद रखने के
लिए नया नाम दिया है, जैसे मुझ रांची निवासी को उन्होंने स्वर्णरेखा नाम दिया है. कल
ही उन्होंने आध्यात्मिकता को खूबसूरत शीर्ष दिया. डा. रॉय के पूछने पर कि क्यों
अच्छे लोग ही सताए जातें हैं उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया-“We are all guest on this earth.” अभीतक मैंने “ जाहि विधि
राखे राम ताहि विधि रहिये “ ही जाना था.
ऐसा नहीं कि मात्र प्रबुद्ध बातें ही होती हैं. कुछ दिन पहले तक सबके सर के
बाल बढे हुए थे. तभी मैं हजामत-याफ्ता वहां पहुँच गया. आहूजा पूछ ही बैठे कि मैंने
हजामत कहाँ बनवाई. इधर हजामत बनवाना भी एक जहमत है. एक्सप्लोसन तब हुआ जब उन्हें
पता चला कि ये कलाकृति इन-हाउस थी. मुझे हंसी भी आ गयी बताने में. शुरूआती कोशिश
मैंने खुद की. बिगड़ गया. पत्नी सवारने आयीं और बिगड़ गया. आखिरकार मेरे दामाद ने
मामला सम्हाला. सब मिलजुला कर, किसी को शक नहीं होता था कि मैं सैलून नहीं गया था.
अहुजा ने तुरत तुप्पा कसा- “आपको तीन फायदे और एक नुकसान हुआ. पैसा बचा. समय बचा, दूर कार से लिवाजाने के लिए किसी की सिफारिश नहीं करनी पड़ी पर कोमल उँगलियों का सर पर
थिरकना गवां बैठे”. एक जोरदार ठहाका तो बनता ही था. कभी-कभी बच्चे शोरगुल भूलकर
हमलोगों की तरफ देखने लगते हैं.
पूरे हफ्ते, डा. रॉय अपने बेटे से नाराज रहे. सतीश बाबू के बेटे ने तो यहाँ तक
कह दिया कि अब इस उम्र में इतनी जल्दी-जल्दी हजामत बनाने की क्या जरूरत आन पड़ी.
इस सोमवार सभी की हजामत बनी हुई थी. पर सबसे ज्यादे उखड़े हुए आहूजा जी थे. एक बार भी स्पर्श नहीं हुआ. सबकुछ मशीन से. उसपर तुर्रा यह कि कम्युनिकेशन गैप. इन्हें वैसी इंग्लिश बोलना नहीं आती थी जो वो समझ सके और उसका एक्सेंट इनके पल्ले नहीं पड़ता था. इंटरप्रेटर गैरमौजूद. आस-पड़ोस में फिरंगी और लड़का बाहर किसी दूसरे काम में मशगूल.
इस सोमवार सभी की हजामत बनी हुई थी. पर सबसे ज्यादे उखड़े हुए आहूजा जी थे. एक बार भी स्पर्श नहीं हुआ. सबकुछ मशीन से. उसपर तुर्रा यह कि कम्युनिकेशन गैप. इन्हें वैसी इंग्लिश बोलना नहीं आती थी जो वो समझ सके और उसका एक्सेंट इनके पल्ले नहीं पड़ता था. इंटरप्रेटर गैरमौजूद. आस-पड़ोस में फिरंगी और लड़का बाहर किसी दूसरे काम में मशगूल.
अब आहूजा जी इंडिया जाकर ही हजामत बनवायेंगे. उनका बार्बर कम से कम 10 मिनट सर
की मालिश करता है. अब तो वह T20 खेलों पर भी बोलने लग गया है. पोलिटिकल इतना कि
किसी का भी सर चकरा जाये. इस समय वह लोगों को वह बता रहा होगा जिसपर शायद ही किसी का ध्यान गया हो. वह यह कि सुषमा स्वराज की
फजीहत के पीछे नरेन्द्र मोदी का हाथ है. वह भी पूरे सबूतों की साथ. जब राजनीति का वेत्ता कोई भी आम आदमी आज
के दिन सैलून के बाहर निकलता होगा तो सबको बड़े कॉन्फिडेंस के साथ यह खुलासा बताता
होगा वह भी जरूरत से ज्यादा सबूतों के साथ. गए जमाने में तो रामायण और महाभारत की
शुरुआत कुछ ऐसे ही हुई होगी. और कुछ नहीं तो अकबर महान की महानता में उसका भी कुछ
तो हाथ रहता होगा जिसके सामने सबका सर झुक जाता है. अब आप ही बताएं सबसे बड़ा
उभयमुखी कौन है ? क्या वह जो सर की हजामत के साथ-साथ दिमाग की भी हजामत कर देता है
? क्या कभी हमलोगों ने रंग-बिरंगे आसमान, पेड़-पौधों, जानवरों अथवा संक्षेप में प्रकृति
के केश-विन्यास को निरखा है ? क्या कभी हमलोगों ने अपने-अपने भगवानों का हेयर
स्टाइल गौर किया है ?

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