Monday, April 27, 2015

एक और बावर्ची !

हम पांच बच्चों के पास कुल पांच आने (आज का पच्चीस पैसा) थे । पिकनिक के बारे में हमलोग बहुत सुनते थे । एक दिन मौका मिल ही गया । चौराहे के बनिए ने सूजी, चीनी और देसी घी थमाते हुए सुझाया - कुम्हरार चले जाओ पिकनिक करने ।
वहां टूटे अशोक स्तम्भ की छाया में, सूखे पत्तों की आग में हमलोगों ने लपसीनुमा हलवा बनाया और खाया भी।
नियमित खाना बनाने का बीजमंत्र बाबूजी ने दिया । नौकरी लगने के बाद जब अकेले रहने की नौबत आयी तब उन्होंने कहा - स्वस्थ रहना है तो खुद खाना बनाना ।और कैटेलिटिक सहायता हमलोगों के सीनियर सतीश मित्तल मेहरोत्रा ने दी । वे मुझे और मेरे हमउम्र बैचलर आर्य समायजुला लक्ष्मण राओ को छुट्टियों के दिन घर पर कुकिंग सिखाने आ जाया करते थे । मैंने ताउम्र सेलिब्रेशन के मौकों पर ही होटल का खाना खाया ।
शायद आखिरी हथौड़ा फ़िल्म "बावर्ची" ने लगाया । नायक को खाना बनाकर खिलाने में बेइंतिहा आनंद मिलता था । इसके एक डायलाग ने मेरे जीवन में कुछ बदलाव तो अवश्य लाया - "किसी बड़ी ख़ुशी के इंतज़ार में हम ये छोटी छोटी खुशियों के मौके खो देते हैं."
शादी के बाद भी मैं अपनी श्रीमती को आराम देने की खातिर ज्यादातर जब घर में मेहमान आते थे किचन में सहयोग देने घुस जाया करता । इस प्रवृति को धक्का तब लगा जब उन्होंने मेरे दोस्त से मेरे सामने शिकायत की कि मैं उन्हें लज्जित करने के लिए ऐसा करता हूँ । यह अवधारणा तब ख़त्म हुई जब वे काफी दिनों के लिये बिमारे-बिस्तर हो गयीं ।
लोगबाग मेरे बनाये खाने की फ़रमाईश करने लगे । मैं चाहे जैसा भी खाना बनाऊं लोग तारीफ़ ही करते । मुझे लगता वैसा ही जैसा मित्र की कविताओं की ।
बहुत  दिनों तक तो मुझे लगा कि मुझे बेबकूफ़  बनाया जा रहा है । मेहमान जिनके पास निगलने के सिवा कोई चारा न रहता है, लोगबाग जिन्हें मुझसे पार्टी लेनी है और  उनकी औरतें जो बेगारी से निजात चाहती हैं ।
मुझे ज्यादा लोगों के लिए भोजन बनाना बहुत बाद में आया । अब तो मेरी बनायी नॉन वेज बिरयानी कभी-कभी मुझे भी लाजवाब कर देती है ।आनंद तब आता है जब घर के अंदर पैर रखते ही लोग फ़ैली खुशबू की तारीफ़ करने लगते है और जब पूरी बिरयानी सफाचट हो जाती है । इसके सिवा मेरे पास और दूसरी कसौटी भी तो नहीं है ।
मैं  बरसों से गंधहीनता(Anosmia) और  कुछ हद तक स्वादहीनता(olfactory) से ग्रसित हूँ ।

Tuesday, April 14, 2015

वह रिक्शावाला !

पिछले वर्ष शायद इसी मौसम में मैं सुबह की सैर से मंदिर होकर वापस लौट रहा था. तभी पीछे से किसी बच्ची की आवाज सुनाई पड़ी. वह पूछ रही थी – अंकल ! प्रेसिडेंट में एस होता है ना ! और अंकल ने जवाब दिया – "हां बेटे ! It is P R E S I D E N T .  PRECEDENT में C होता है, जिसका मतलब “मिसाल” होता है." लगता था अंकल और बच्ची किसी रिक्शे पर आ रहे थे. पर ये क्या ? जब रिक्शा बगल से गुजरी तो रिक्शे पर 7-8 वर्ष की दो बच्चियां बैठीं थीं. अंकल कोई और नहीं वह रिक्शा वाला ही था. अंग्रेजी की इतनी समझ साफ़ बता रही थी कि वह काफी पढ़ा-लिखा था. वह बच्चियों को स्कूल पहुंचाने ले जा रहा था. इसके बाद दो-तीन बार उनलोगों से भेंट हुई पर दूरी इतनी थी कि उनलोगों के मध्य बातों का विषय और माध्यम क्या था पता नहीं लग पाता था.
आज वह रिक्शावाला सामने से आता दिख ही गया. वही दो लडकियां बैठी थीं. इतनी सुबह, वह भी चेहरे पर मुस्कुराहट लिए इस ढलती उम्र में मानों मेरी तरह सुबह की सैर में निकला हो. एकदम ऐसा लग रहा था कि उसके पैर पैडल को लयबद्ध गोल घुमा रहे थे. कद-काठी और पहनावा किसी आम रिक्शेवाले की तरह, चेहरा भी धुप में झुलसा हुआ लंबा तिकोना पर आँख में गजब की चमक थी. वह 65 के आस-पास का लग रहा था. रिक्शा चलाने वाले अपनी उम्र से 10 वर्ष ज्यादा के ही दीखते हैं. इच्छा तो हुई कि उसे रोककर उसके बारे में और जानें पर सोचने में जितना वक्त गुजरा उसमें वह बहुत आगे निकल गया. मैं भी उसी दिशा में बढ़ गया जिधर वह रिक्शा वाला गया था. कोई 100 मीटर चलने के बाद बाईं तरफ मोड़ पर स्कूल बस स्टैंड पर खड़ी दिखी. लड़कियों को उतार कर वह वही रिक्शे पर आराम से बैठ गया. वह जरूर उनकों बस पर चढाने के बाद ही वहां से जाएगा. 

एक दिन फिर दिखा. रिक्शे पर बैठे एक वृद्ध के लिए सब्जियां खरीद रहा था. सावले, तिकोने, लम्बे चेहरे पर बढ़ी हुई दाढ़ी उसका मजहब बता रही थी. पर संतोष भरे चेहरे पर चमकती आँखे बहुत कुछ और भी बता रही थी.
2-3 महीने की उत्सुकता भरी जानकारी जो इक्कठी हुई वह इस प्रकार है.
वह वृद्ध मुसलमान रिक्शेवाला कभी बुक-बाईंडिंग का काम करता था. वहीं किताबों के ढेर ने उसे पढ़ा लिखा कर सयाना किया. शायद थोडा ज्यादा और बहुत ठीक तरह से.
बाल-बच्चों को बसाने और औरत के इंतकाल के बाद वह अकेले बहुत दूर किसी भी अनजान आशियाने की खोज में निकल पडा. सबसे मुफीद जगह उसको यही मदरसे और मस्जिद की पिछली दीवारों से सटी एक 8/8 की खोली में मिली. बस सुबह ज़िंदा रहने भर के लिए कमा लिया करता. तबियत पसंद समय तक सुबह के समय की रिक्शा चालन उसके स्वास्थ्य को ठीक रखती. बाकी समय वह किताबों और रद्दी अखबारों में उलझा रहता. कहने की आवश्यकता नहीं है कि उसका सुफिआना अंदाज जाहिर कर रहा था कि ज्यादातर जहीन पढाई ही करता होगा.
खोली के बाहर जरूरत पड़ने पर ही चुल्हा जलता था. ज्यादातर उसके भोजन का इन्तजाम उसके सवारीवाले कर दिया करते थे. रिक्शा वह सुबह ही चलाता था जिससे उसकी जरूरत पूरी हो जाती थी. हाँ वह कुछ पैसे बैंक मे जोड़ता रहता था जिसका कारण वह नहीं बता पाया. उसने बड़ी मासूमियत से मुस्कुराते हुए कहा कि उसके जानकार और मदरसे वाले उसके कफ़न का इन्तजाम कर देंगे.
इस तरह का चरित्र मुझे सॉमरसेट मॉम के "रेजर'स एज" में दिखा था. नायक लैरी सबकुछ आजमाने के बाद टैक्सी चलाने लगता है. हर समय नए लोग, नयी जगह; जुड़ पाने की कोई संभावना नहीं.
और बाद में आयन रैंड  के "फाउंटेनहेड" में दिखा था. आर्किटेक्ट नायक रोर्क कोयले की खदान में मशक्कत करने चला जाता है. 

पुनःश्च 12.09। 2025  :  

आज जब मैं 10:00 बजे सुबह व्हीलचेयर पर घूमने निकला तो मुझे वही रिक्शावाला 10 वर्ष बाद एक गुलमोहर के पेड़ के नीचे बैठा दिखा। वैसा ही शांत चेहरा और तीखी नजरें। मैंने तो उसे तुरंत पहचान लिया पर वह उसे काफी देर लगी वह भी तब जब मैं उसे 10 वर्ष पहले की बातें याद दिलाई । उसने ज्यादा उम्र के कारण रिक्शा चलाना कब का छोड़ दिया था । उसने पास ही एक छोटा सा घर बना लिया था।  उसका एक बड़ा बेटा फौज से रिटायर होने के बाद उसे खोज ही निकाला। उसका बेटा अब एक सिक्योरिटी एजेंसी में काम करता है । वह अपने बच्चों के साथ अपने अब्बू के पास ही रहता है। अब इरफान सुबह की सैर के बाद कोई मुफीद जगह देख कर थोड़ी देर आराम कर  अपने घर लौटता है।