I may swap my next life with any other creation. I feel that every other creation except the homo sapiens lives a natural better, different and most likely a more vibrant life !
कॉलेज जाते वक्त शहर के मशहूर काली मंदिर के मोड पर दोनों पैर से अपंग एक भिखारी को मैं कुछ भी पैसे जरूर देता था । इधर-उधर सरकने के लिए उसके हाथ में पहनने वाली चप्पल दिखती थी । बहुत संतोषी था । कभी पैसे नहीं रहने पर वह मुस्कुरा कर "कोई बात नहीं" कहता था । और तो और ,मेरे जानकार कहते हैं कि वे लोग जरूरत पड़ने पर उससे पैसे भी उधार लेते थे। एक दिन सुबह-सुबह, कॉलेज जाने के दरम्यान देखा कि वह रिक्शे से अपनी भीख मांगने वाली जगह पर उतर रहा था । कोई बात नहीं । भिखारी भी तो हम जैसे आदमी होते हैं । शौक हुआ होगा । बरसो बाद पता चला कि शहर में उसके 25 से ज्यादा रिक्शे चलते थे । यह भी कि वह सूद पर पैसे देता था । बाल-बच्चों वाला शादी-शुदा उसके तीन मकान थे । सबसे छोटे वाले में वह अपने परिवार की साथ रहता था । मौत के समय उसकी हैसियत करोड़ों की जरूर रही होगी । उसके बच्चे तो अब पढ़-लिख कर अच्छे ठिकानों पर होंगे पर हाय कोई उसे अपना बाप मानने को तैयार नहीं होता होगा ।
घर के गेट पर एक भिखमंगा आया करता था । लम्बा-चौड़ा, काला भुजंग, शरीर पर नाममात्र को कपडे और कंधे से लटकती झोली । आते ही गला फाड़कर आदिवासी भाषा में चिल्लाता था – हे मालिक-माई, भिक्का मिलोक नी ! 2-3 मिनटों बाद दुबारे चिल्लाता जोर से इतना कि घर के पिछवाड़े, जो कि काफी दूर था, आवाज़ चली जाये । उसके कुछ देर बाद भी अगर सुनवाई नहीं हुई तो अपनी भाषा में बुदबुदाने लगता था ।इसकी नौबत आये उसके पहले ही हममे से कोई दौड़कर उसे दान दे देते थे । आते-जाते, देखते सुनते , मैंने पाया कि वह कुछ ही घरों में जाया करता था भीख मांगने और वह भी तब जब उसके पास खाने को कुछ नहीं बचता था । कभी हफ्ते में दो बार कभी पखवारे में एक बार,उसकी भीख-यात्रा बहुत सीमित और कभी-कभी होती थी। पर मुझे ऐसे स्वस्थ का भीख मांगना नहीं भाता था । शायद दिमाग से हल्का या फिर कोई फ़क़ीर था या दोनों ही ।
1998 के बाद, कई वर्षों तक, मुझे रांची से मुंबई-पूना जाना पड़ता था वह भी वर्ष में दो-तीन बार । बच्चो की पढ़ाई और बाद में उनकी नौकरी कारण थी । तब राउरकेला स्टेशन पर ट्रेन की दो बोगी कटकर मुबई-हावड़ा मेल से जुडती थी । अब तो रांची से मुंबई और पुणे की डायरेक्ट ट्रेन हैं ।
उन दिनों के सफर की दो बातें कभी नहीं भूलेंगी । एक तो वह नवजवान जो चाय बेचता था । सलीके के कपड़ों में, अच्छी हिंदी बोलता हुआ, चाय बेचते समय वह हांक लगाता था – खराब चाय, ख़राब चाय !” उसकी चाय देखते-देखते बिक जाती थी । इलायचीदार चाय बेशक पीने लायक होती थी । दूसरा वह भीख मांगने वाला । एक पैर से लूला, आँखों पर काला चश्मा भी, शायद अंधापन छिपाने के लिए, देह पर मात्र बदबूदार काबुलीवाला लम्बा कुरता जो पूरे देह को ढंकने के लिए पर्याप्त । शरीर से एक् काठी का स्वस्थ और तीखे नाक-नक्शों वाला । आज के एक्टरों से तुलना करें तो करीबन नवाजुद्दीन सिद्दकी सा । बोगी में घुसते ही गधे से भी बेसुरे अंदाज में कोई फ़िल्मी भजन पूरे दम-खम के साथ रेंकता हुआ । उसके घुसते ही हमलोग सभी का हाथ पैन्ट की जेब में चला जाता था । किसी में उसे बर्दाश्त करने की हिम्मत नहीं होती थी । सोये हुए नींद से जागते ही नहीं थे कुछ न कुछ उसके हाथ पर दे देते थे । चायवाला उसके बाद आता था । ज्यादा बिक्री होती थी इसलिए ।
एक बार 2003 दिसम्बर में, मैं गीतांजलि से रांची लौट रहा था । सुबह 5 बजे राउरकेला स्टेशन उतरा । रांची जाने वाली ट्रेन आठ बजे आने वाली थी । वेटिंग हॉल में बेंच की पैर से लगेज को चेन व् ताले से सुरक्षित कर और अटेंडेंट को ताकीद कर मैं दाहिने तरफ प्लेटफार्म का अंत खोजने निकल पड़ा । उसके पहले ही एक छोटा अंडाकार पार्क दिख गया । छोटे-छोटे पेड़ और फूल के पौधों से भरा हुआ और अन्दर बेंच भी । सिगरेट पीने की बहुत ललक हो रही थी । प्लेटफार्म या स्टेशन परिसर में इसकी कानूनन मनाही हो चुकी थी । मैंने दो आदमकद पेड़ के बीच में छिपने की जगह ढूंढकर सिगरेट जला ली । अभी पौ फटने में देर थी । तभी बेंच के पास कुछ हलचल दिखी । एक मेरी उम्र का आदमी अपने अच्छे साफ़-सुथरे शर्ट पैंट उतारकर न जाने क्या कर रहा था । अभी भी अँधेरा था ही । मैं गौर से देखने लगा । चड्ढी पहने हुए वह बेंच पर किनारे बैठ गया । अपने एक पैर को घुटने से मोड़कर एक कपडे के पट्टे से उसने एकदम बाँध दिया । उसके बाद उसने एक लम्बा कुरता पहन लिया । अरे ! यह तो वही काबुलीवाला कुर्ता था । ये तो वही लंगड़ा-अँधा भिखारी था ट्रेन वाला ।अपने उतारे हुए कपडे लपेट उसने कंधे से लटकते झोले में डाल लिया । उसने एक सिगरेट निकली, जलाई और बेंच में बैठ कर कश लेने लगा । मुझमे भी हिम्मत आ गयी । मैं उसके बगल में जाकर बैठ गया । उसने मुझे ऊपर से नीचे देखा । मेरी आधी से ज्यादा ख़त्म होती सिगरेट को देखा । हमदोनो ने एक दूसरे को समझ लिया था । मैंने एक दूसरी सिगरेट जला ली । मुझे ज्यादा मान-मुनव्वत करने की जरूरत नहीं पड़ी । ऐसे भी उसने बताया कि वह अब यह पेशा सदा के लिए छोड़कर रिटायरमेंट की जिंदगी बसर करने वाला था ।
वह बीए पास था । शादी-शुदा और दो लडकियां । किसी भी दिहाड़ी काम से घर का गुजारा नहीं हो रहा था । ट्रेन पर उसने अखबार,किताबें, और न जाने क्या-क्या बेचने का काम किया । वह अपनी लड़कियों को बेहतर शिक्षा और स्वावलंबी बनाने का ख्वाब संजोये हुए था। इस दरम्यान उसने देखा बिना किसी लागत के पैसा कमाने का तरीका । वह भी जितना चाहो उतना । हारकर नहीं बहुत समझ-बूझकर उसने ये पेशा अपनाया । उसके घर में सभी को ये मालूम था कि वह बंधी-बंधाई नौकरी पर है । राउरकेला-नागपुर लाइन पर उसके जानने वाले के मिलने की सबसे कम गुंजाईश थी । साथ ही, इस रूट पर रंगदारी भी कम थी । हाँ, कभी-कभी कंडक्टर, स्टेशन मास्टर को कुछ लेना-देना पड़ता था । रिटायरमेंट इसलिए कि बच्चे अब पूरी तरह सेटल कर गए थे पढ़-लिख कर ।
लौटते समय मैंने उससे हाथ मिलाया उसे यह जताने के लिए कि मुझे वह उन लोगो से अच्छा लग रहा था जो हारकर नाली के गंदे कीड़े- गुंडे/मवाली बन चुके थे या जीतकर पाप की दुनिया के कीड़े बनकर पूरे समाज और देश को बर्बाद कर रहे थे । मैंने मुस्कुराते हुए एक अंतिम प्रश्न पूछ ही लिया । वह इतना बेसुरा, भद्दा क्यों गाता था जबकि उसकी जुबान और रुझान दोनों में महीनीयत थी । वह हंसने लगा, पूछा क्या दिलीप कुमार की “राम और श्याम” फिल्म का वह सीन याद है जब राम या श्याम तुलसी रामायण बाख रहा था । कुछ देर तो हुई पर जब हँसे तो मिलकर हँसे और ठहाका लगाकर ।
हमलोग जीवन भर यही समझने में लगा देते हैं कि दुनिया ने हमें क्या दिया । अगर नवों दिशाओं आने वाली हवा अपना सम खो दे तो मनुष्य खड़ा भी न रह पायेगा। अगर सामने की हवा गायब हुई तो वह औंधे मुंह गिरेगा.अगर पीछे से तूफानी हवा आयी तब भी। इसी तरह जीवन को भी अपने आस-पास के अपने जैसे लोग लोग सम्हालते हैं। इन्ही अपनों के चलते जीवन का सफ़र देखते-देखते कट जाता है।
आज सुबह आकाश में प्रवासी बत्तकों ( गीज़) की पंक्तिबद्ध कतारें देखते हुए मंजिल और मकसद की रवानगी पर विस्मय हो रहा है । कैसे उनकी तीर के नोक जैसी पंक्ति एक-दूसरे कि मदद करते इतनी दूर की यात्रा कर रही थी । अपने बच्चों को बेह्तर सुख-सुविधा देने की खातिर कितना कुछ दांव पर लगा रहे थे । चाहे पशु हों,पक्षी हो या आदमी हो ,कितनी समानता है ! हम मनुष्यों में भी । चाहे वह राजा हो,आम आदमी हो या फिर कोई और । उसकी भी बरबस याद आ रही है । मुझे वह कभी रांची की सड़कों पर दिख जाता है, कभी मुंबई की लोकल में या फिर न्यूयॉर्क के सबवे में पर हमेशा पहुँच से दूर,बहुत दूर !.
Since childhood, I have heard and watched apathy towards senior citizens. Sitting in forlorn benches in empty parks, culverts or stopover bus stands, either alone or in pairs, watching activities around with almost blank eyes, they present a pitiable vision. Since childhood, I used to imagine my old age in a similar scenario. It used to give me shudders. Perhaps, from then on, I was harnessing myself with odds and means that would keep me useful at the other side of the age. Did I succeed? Let us share and exchange notes.
My separation from the employer of 33 year standing was nearing to an end. It had been customary to start packing up when there were only six months left. That included getting no further fresh assignments, handing over of files and inventory, readying papers for separation benefits and insurance etc., and enjoying the last days by adhering to official work schedule of 8 hours without overstaying or over-stressing. This included no promotion even if a promotion was due. But then, we had to manage a parliamentary affairs committees’ visit due within 30 days to appraise the safety, fire fighting and environment management status of the PSU that was the Heavy Engineering Corporation. I was the Corporate Chief.
Everybody was nervous since such committees were a nasty nuisance. The visit came off to our satisfaction. The Chairman commented in my annual appraisal-“He is a useful person.” This was a new and strange quip for me as well as my other colleague technocrats. My colleagues made fun of it. Appraisal of others contained far more words and sentences. I got only this much to ponder about.
The bombshell fell when I was found promoted in a list of only 14% promotees. This has never happened that too involving a non-productive discipline. Everybody started consulting dictionaries including me. At that time in 2003, we could get the Oxford dictionary which wrote the meaning of USEFUL -“Able to be used for a practical purpose or in several ways: such as aspirin is useful for headaches “. This did not help.
Soon after I retired. I was searching for ways and means to fill the gaping void. I began with researching upon that important word. I saw the best and most superlative meanings in the Collins. It was-“advantageous, all-purpose, beneficial, effective, fruitful, general-purpose, helpful, practical, profitable, salutary, serviceable, valuable and worthwhile.” I was dazed. The Chairman was a man of few words. But nobody ever thought of him to be so precise.
This impetus was going to change the way I was looking towards my other side of the age. I was to keep myself busy.
In my childhood, my father branded me as uncle Podger. I indulged in everything that came in my sight, right from hanging a picture to repairing a radio, most of the time getting bad results. But I never felt defeated. When I was of my own, this habit of “jack of all arts” accentuated. Like a spider, I tried my finesse at everything before assigning the spoil to the right technician. With time, I became somewhat of an expert in most of the affairs of life. Perhaps, this trait brought the above judgment. Perhaps this property kept me optimistic. Surely, I began to love my old age.
The biggest advantage that I have is that I am able to keep myself busy and hence insulated from the devil hacking my brain. I can diversify a lot.
I love keeping myself informed. The media, the books and other textual prints presents a galaxy of choice. I enjoy both fictions and non-fictions but the best sellers lure. I am attracted more towards English, Hindi and Bangla literature in the order written. I do not refrain from prose and numbers in other languages indigenous or foreign provided I get their translation in Hindi or English. These days, I go to the bottom of a story by comparing notes with the internet, film media, textual prints, audio books and vice versa. Recently, I was able to understand the meaning implicit in feature films like “ The Story of Everything”, "The Birdman",“The Snows of Kilimanjaro”, “Ada”, “Roshomon(Japanese)” , of course, the Bangla masterpieces of Satyajit Ray and last but not the least recently released Bangla film “ Jatishwar”. This film introduced me to Ian Stevenson who performed extensive research on reincarnation; that led to reincarnation sample Lugdi Devi/Shanti Devi; that interested Mahatma Gnadhi ; and particularly to the famous Portugese Anthony Firangee ( Hansmann Antony) turning into a Bangali genius. I read “To Kill a Mocking Bird” and “Pather Panchali (Bangla)” and later saw the motion pictures to my utter satisfaction and pleasure. These days, I am immersed in Tagore’s Gitanjali through English translation by the author himself. I have downloaded “The Wings of Fire” by the great Bharat Ratna Mr. APJ Abdul Kalam for future reading in depth along with his “The Ignited Minds”.
I get intoxicated while writing blogs and for electronic magazines such as Ezine, Hub pages and the likes. My blogs again touch a mosaic of disciplines. I dwell in spiritual, political, informative, technical, essays and fictions but what is to my heart are the memoirs that were interesting as well as shocking with flair of adventurism and icing of idealism to convey and conclude.
Cookery is my trump card. This is my stress buster. At the outset, I cook to relieve pressure from routine kitchen workers in my household or anywhere. I cook to get appreciation from people. This past-time includes every aspect related to food such as procurement of raw materials to washing utensils.
Like a child I love to explore in what comes in my way. Therefore, children become my good friends. Friends are the lifeline of a life. We resonate very well to the delight as well as a few annoyances of others.
At the end of a day, most of the times, I find myself short of time. That is because I love the infinite of which I am but a tiny partner.
I love with loyalty and integrity as riders. I always rear to draw distant to near, near to nearer and nearer to the nearest. I trust that without these features love loses its meaning. That is way forward from materialism to spiritualism, from duality to non-duality, to finally become integrated with the mother nature.
Mother nature overwhelmes me. I worship her, besides every known gesture, by publicly sharing what I behold through the eyes of camera. For example, my beholding of the sunsets get inspiration from the famous Tagore quote- "Clouds come floating into my life, no longer to carry rain or usher storm, but to add color to my sunset sky." This indulgence seals tight any leakage in the time baloon.
I am confidently conceited that I am welcome in most of the places I reside, either with my children for a considerable period or with others for the shortest most period. I am anxiously awaited at the park bench where senior citizens get together for a respite after a healthful walk. Only few days back, my gainfully employed daughter insisted me to extend my stay for a few months more.
I wish everybody of you to succeed and enjoy your bonus period to the fullest. There are a few fortunate who see their old age.
Prove that old has always been gold and would remain so for ever.
Now celebrate your stay on this holy earth as a guest of mother nature !
इस बार मेरी अमेरिका यात्रा में एक आयाम और जुड़ गया. वेस्ट विंडसर में भारत के
लगभग सभी प्रदेशों के लोग रहने लगे हैं . रहते तो और जगह भी हैं पर यहाँ लोगबाग
बहुर्मुखी, अन्तर्मुखी कम और उभयमुखी ज्यादा हैं. ambivert में एक खासियत ये भी
होती है कि ऐसे लोग extrovrt और introvert में भी खुलापन ला देने की क्षमता रखते
हैं. सीनियर सिटीजन में यह और भी उभर जाता है. जो अमेरिका में 19वीं शताब्दी में काऊबॉय
श्रेणी में दिखता था अब वही बुजुर्ग भारतीय आगुन्तकों में दिख रहा है. मसलन पार्क
की बेंच पर बैठे उत्तराखंड के आहूजा दूर गुजरते हैदराबादी गोपाल राव को वही से
हांक लगाते हैं- “अरे भाई राव ! एक नजर इधर भी.” IIT, खड्गपुर के मैथमेटिक्स के रिटायर्ड
प्रोफेसर डा.रॉय सुबह की सैर में इतनी जोर से अपनी आत्मकहानी सुनाते चलते हैं कि
घर के अंदर सोये लोगों की नींद खुल जाए. 50 वर्षों का क्लास रूम लेक्चर आवेग तो जाहिर करेगा ही. 82 वर्षीय मूर्तीगारू जब भी हमेशा की तरह
टूटे झूले को ठीक करने की बात करते हैं तो लखनऊ के 81 वर्षीय सतीश बाबू उन्हें
मीठी झिडकी लगाने से नहीं चूकते. शाम के समय पार्क में हमलोगों की बैठक काफी
भरीपूरी हो गयी है. मेरी उम्र उनमें सबसे कम है इसलिए मैं इनलोगों का मैन फ्राइडे
हूँ. बेंच ठीक करवाना मेरे जिम्मे है. सबकी कथाएं सुनना मेरा कर्त्तव्य है. अब
मेरी उम्र से होड़ लेने कोलकता से दास मोशाय भी आ गए हैं. चूकीं कोलकाता एक “सिटी
ऑफ़ जॉय” है और ज्यादातर लोग इस शहर से वाकिफ हैं इसलिए बातें करने का एक और मसला
मिल गया है. आजकल 12 में से 6 जन तो जुट ही जाते हैं. वहां आने, बैठने और गुजरने
वाले अमेरिकन, चाईनीस, जेपनीस, कोरियाई, पाकिस्तानी और मेक्सिकन अचम्भे से कम और स्नेह ज्यादा देखने लगें हैं.
ऐसा खुलापन, बैठकर समय गुजारने का समय और मिलनसारिता भला अब कहाँ देखने को मिलती
है. हमलोग किसी भी मसले पर बातें कर लेते हैं.
दिखने में सबसे वयोवृद्ध, छड़ी का सहारा लेते हुए भी हवा के तेज झोकों से
सिहरते, माननीय मुरली कृष्ण जी तेलगू और इंग्लिश बोलते हैं. दिल और फेफड़े की
बिमारी के बावजूद सदैव मुस्कुराते दीखते हैं. हमलोगों सभी को उन्होंने याद रखने के
लिए नया नाम दिया है, जैसे मुझ रांची निवासी को उन्होंने स्वर्णरेखा नाम दिया है. कल
ही उन्होंने आध्यात्मिकता को खूबसूरत शीर्ष दिया. डा. रॉय के पूछने पर कि क्यों
अच्छे लोग ही सताए जातें हैं उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया-“We are all guest on this earth.” अभीतक मैंने “ जाहि विधि
राखे राम ताहि विधि रहिये “ ही जाना था.
ऐसा नहीं कि मात्र प्रबुद्ध बातें ही होती हैं. कुछ दिन पहले तक सबके सर के
बाल बढे हुए थे. तभी मैं हजामत-याफ्ता वहां पहुँच गया. आहूजा पूछ ही बैठे कि मैंने
हजामत कहाँ बनवाई. इधर हजामत बनवाना भी एक जहमत है. एक्सप्लोसन तब हुआ जब उन्हें
पता चला कि ये कलाकृति इन-हाउस थी. मुझे हंसी भी आ गयी बताने में. शुरूआती कोशिश
मैंने खुद की. बिगड़ गया. पत्नी सवारने आयीं और बिगड़ गया. आखिरकार मेरे दामाद ने
मामला सम्हाला. सब मिलजुला कर, किसी को शक नहीं होता था कि मैं सैलून नहीं गया था.
अहुजा ने तुरत तुप्पा कसा- “आपको तीन फायदे और एक नुकसान हुआ. पैसा बचा. समय बचा, दूर कार से लिवाजाने के लिए किसी की सिफारिश नहीं करनी पड़ी पर कोमल उँगलियों का सर पर
थिरकना गवां बैठे”. एक जोरदार ठहाका तो बनता ही था. कभी-कभी बच्चे शोरगुल भूलकर
हमलोगों की तरफ देखने लगते हैं.
पूरे हफ्ते, डा. रॉय अपने बेटे से नाराज रहे. सतीश बाबू के बेटे ने तो यहाँ तक
कह दिया कि अब इस उम्र में इतनी जल्दी-जल्दी हजामत बनाने की क्या जरूरत आन पड़ी. इस
सोमवार सभी की हजामत बनी हुई थी. पर सबसे ज्यादे उखड़े हुए आहूजा जी थे. एक बार भी
स्पर्श नहीं हुआ. सबकुछ मशीन से. उसपर तुर्रा यह कि कम्युनिकेशन गैप. इन्हें वैसी
इंग्लिश बोलना नहीं आती थी जो वो समझ सके और उसका एक्सेंट इनके पल्ले नहीं पड़ता
था. इंटरप्रेटर गैरमौजूद. आस-पड़ोस में फिरंगी और लड़का बाहर किसी दूसरे काम में मशगूल.
अब आहूजा जी इंडिया जाकर ही हजामत बनवायेंगे. उनका बार्बर कम से कम 10 मिनट सर
की मालिश करता है. अब तो वह T20 खेलों पर भी बोलने लग गया है. पोलिटिकल इतना कि
किसी का भी सर चकरा जाये. इस समय वह लोगों को वह बता रहा होगा जिसपर शायद ही किसी का ध्यान गया हो. वह यह कि सुषमा स्वराज की
फजीहत के पीछे नरेन्द्र मोदी का हाथ है. वह भी पूरे सबूतों की साथ. जब राजनीति का वेत्ता कोई भी आम आदमी आज
के दिन सैलून के बाहर निकलता होगा तो सबको बड़े कॉन्फिडेंस के साथ यह खुलासा बताता
होगा वह भी जरूरत से ज्यादा सबूतों के साथ. गए जमाने में तो रामायण और महाभारत की
शुरुआत कुछ ऐसे ही हुई होगी. और कुछ नहीं तो अकबर महान की महानता में उसका भी कुछ
तो हाथ रहता होगा जिसके सामने सबका सर झुक जाता है. अब आप ही बताएं सबसे बड़ा
उभयमुखी कौन है ? क्या वह जो सर की हजामत के साथ-साथ दिमाग की भी हजामत कर देता है
? क्या कभी हमलोगों ने रंग-बिरंगे आसमान, पेड़-पौधों, जानवरों अथवा संक्षेप में प्रकृति
के केश-विन्यास को निरखा है ? क्या कभी हमलोगों ने अपने-अपने भगवानों का हेयर
स्टाइल गौर किया है ?
मेरी उम्र १३ वर्ष थी जब मैंने स्कूल पास किया. कॉलेज में भी मेरा बचपना बहुत
दिनों तक मेरे साथ रहा. अपनी कॉलोनी में हमलोग सरस्वती पूजा करते थे. चन्दा
बटोरना, प्रतिमा स्थापित कर पूजा से ज्यादा धूमधाम मचाना और विसर्जन के बाद सार्वजनिक
भोज का आनंद उठाना कुछ ऐसे क्षण होते थे जो पुनः अगली बसंत पंचमी की बाँट जोहाते
रहते थे.
सार्वजनिक भोज का सारा इंतजाम झा अंकल के घर होता था. एक बार, जब झा आंटी पूरी
का आटा गूंथ रही थीं तो मैंने उनका सहयोग किया. उनकी ख़ुशी देखकर मैंने पूरियां भी
बेली और कुछ तलकर निकाली भी. भोज में सबसे ज्यादा बार खीर मुझे मिली. उससे दिन
मुझे यह भान हुआ कि थोड़ी सी मदद किसी को कितना विभोर कर देती है. अगले दिन कॉलेज
जाते समय मैंने माँ को कहा कि नेरे लिए वह एक मोटा पराठा या रोटी भर बनाकर रख दे
जिसे मैं सब्जी या मात्र गुड के साथ खा लूँगा. माँ जिसे दर्जन भर लोगों के लिए
नाश्ता और खाना बनाना पड़ता था बहुत खुश हुई. अगले दिन और फिर बहुत दिनों तक मुझे पराठा
या देसी घी से भींगी रोटी मिलती रही आशीष के साथ. मैं भी जब-तब चौके में माँ के
काम में हाथ बटाता रहता था. बाद में यह सिलसिला मैंने भाभी के साथ भी जारी रखा. एक
दिन मेरे बड़े भाई ने प्यार से डांटकर मुझे चौके से निकाला, कहा- “प्रकाश प्रोटोकॉल
बिगाड़ रहा है . आयेदिन मुझे सहयोग न देने के कारण उलाहना मिलता है.” मुझे अपने भाईयों,
रिश्तेदारों और और यहाँ तक कि दोस्तों से भी झिढ़कियां मिलती रही. पर खाना बनाने और
खिलाने का आनंद मैं ताउम्र उठाता रहा.
आज सभी को किचेन में देखा जा सकता है. मजबूरन, जिनकी बीबी अब नहीं हैं या
बीमार रहती हैं या खाना बनाते-बनाते ऊब चुकी हैं. शौकिया, जिन्हें वैसा कुछ
खाने-खिलाने का शौक है जैसा वे चाहते हैं नयी पीढ़ी के लिए तो यह अनिवार्यता हो गयी
है क्योंकि अब मिया-बीबी दोनों नौकरीयाफ्ता हैं.
मेरे एक मित्र एक दिन परेशान से मेरे घर आये. परेशानी से ज्यादा वे परेशानी
में डूबने-उतराने से परेशान थे. मैंने उनके लिए बिरियानी बनायी. खाते समय मैंने उन्हें
बताया कि किताबे पढने, टीवी देखने से ज्यादा आनंददायक और कामगर स्ट्रेस बस्टर खाना
बनाने की व्यस्तता है.
I like the 21st.century, the
accelerated technological explosion, the present generation and above all the
infants and the toddlers. Stephen Hawking has rightly said,”It is clear that we
are just an advanced breed of monkeys…..” The fact is that this children galaxy is more advanced than us. Their
advancement is in logarithmic progression.
I
find my one year maternal granddaughter fondling with the smart phone. She at
least knows for sure that touching screen would make the Utube video disappear.
She manages her soother while sleeping so that it behaves to her desire.
My
two year old grandson has a way of his own. One day, his dad was showing him
some video on the desk top. He was holding his son’s hand to refrain him from
handling the mouse or the keyboard. But he was unaware that his child was using
his toes to adjust bass/treble and volume on the console underneath the table.
One
afternoon both father and son went for a short nap. After one hour, I went to
their room. I found the child staring at the roof while his father was asleep.
When I entered the room, the child put his forefinger on his lips and cautioned
me to not to make any noise lest his father’s sleep would be disturbed.
Such
a scenario development would certainly expect something more surprising from a
five year old. My
maternal grandson Sai was denied his choice toy. While returning from the mall,
Sai sitting in the back seat asked me if I had a piece of rope. When I asked
the reason, he said that he would love to see his dad’s hands tied with the
rope. My son-in-law was aghast. After a little while, Sai asked- “Dad! What is
your age?” Dad replied that he was 35.
Sai
then asked- “Dad! When I would be of your age then would I have a son of my age?”
Dad
replied in affirmative and asked the reason to think about so distant a future.
Sai
replied- “When I would have a son of my age I shall never ever deny him a toy
of his asking.”
हम पांच बच्चों के पास कुल पांच आने (आज का पच्चीस पैसा) थे । पिकनिक के बारे में हमलोग बहुत सुनते थे । एक दिन मौका मिल ही गया । चौराहे के बनिए ने सूजी, चीनी और देसी घी थमाते हुए सुझाया - कुम्हरार चले जाओ पिकनिक करने ।
वहां टूटे अशोक स्तम्भ की छाया में, सूखे पत्तों की आग में हमलोगों ने लपसीनुमा हलवा बनाया और खाया भी।
नियमित खाना बनाने का बीजमंत्र बाबूजी ने दिया । नौकरी लगने के बाद जब अकेले रहने की नौबत आयी तब उन्होंने कहा - स्वस्थ रहना है तो खुद खाना बनाना ।और कैटेलिटिक सहायता हमलोगों के सीनियर सतीश मित्तल मेहरोत्रा ने दी । वे मुझे और मेरे हमउम्र बैचलर आर्य समायजुला लक्ष्मण राओ को छुट्टियों के दिन घर पर कुकिंग सिखाने आ जाया करते थे । मैंने ताउम्र सेलिब्रेशन के मौकों पर ही होटल का खाना खाया ।
शायद आखिरी हथौड़ा फ़िल्म "बावर्ची" ने लगाया । नायक को खाना बनाकर खिलाने में बेइंतिहा आनंद मिलता था । इसके एक डायलाग ने मेरे जीवन में कुछ बदलाव तो अवश्य लाया - "किसी बड़ी ख़ुशी के इंतज़ार में हम ये छोटी छोटी खुशियों के मौके खो देते हैं."
शादी के बाद भी मैं अपनी श्रीमती को आराम देने की खातिर ज्यादातर जब घर में मेहमान आते थे किचन में सहयोग देने घुस जाया करता । इस प्रवृति को धक्का तब लगा जब उन्होंने मेरे दोस्त से मेरे सामने शिकायत की कि मैं उन्हें लज्जित करने के लिए ऐसा करता हूँ । यह अवधारणा तब ख़त्म हुई जब वे काफी दिनों के लिये बिमारे-बिस्तर हो गयीं ।
लोगबाग मेरे बनाये खाने की फ़रमाईश करने लगे । मैं चाहे जैसा भी खाना बनाऊं लोग तारीफ़ ही करते । मुझे लगता वैसा ही जैसा मित्र की कविताओं की ।
बहुत दिनों तक तो मुझे लगा कि मुझे बेबकूफ़ बनाया जा रहा है । मेहमान जिनके पास निगलने के सिवा कोई चारा न रहता है, लोगबाग जिन्हें मुझसे पार्टी लेनी है और उनकी औरतें जो बेगारी से निजात चाहती हैं ।
मुझे ज्यादा लोगों के लिए भोजन बनाना बहुत बाद में आया । अब तो मेरी बनायी नॉन वेज बिरयानी कभी-कभी मुझे भी लाजवाब कर देती है ।आनंद तब आता है जब घर के अंदर पैर रखते ही लोग फ़ैली खुशबू की तारीफ़ करने लगते है और जब पूरी बिरयानी सफाचट हो जाती है । इसके सिवा मेरे पास और दूसरी कसौटी भी तो नहीं है ।
मैं बरसों से गंधहीनता(Anosmia) और कुछ हद तक स्वादहीनता(olfactory) से ग्रसित हूँ ।
पिछले वर्ष शायद इसी मौसम में मैं सुबह की सैर से मंदिर होकर वापस लौट
रहा था. तभी पीछे से किसी बच्ची की आवाज सुनाई पड़ी. वह पूछ रही थी – अंकल !
प्रेसिडेंट में एस होता है ना ! और अंकल ने जवाब दिया – "हां बेटे ! It
is PRESIDENT . PRECEDENT में C होता है, जिसका
मतलब “मिसाल” होता है." लगता था अंकल और बच्ची किसी रिक्शे पर आ
रहे थे. पर ये क्या ? जब रिक्शा बगल से गुजरी तो रिक्शे पर 7-8 वर्ष की दो बच्चियां बैठीं
थीं. अंकल कोई और नहीं वह रिक्शा वाला ही था. अंग्रेजी की इतनी समझ साफ़ बता रही थी कि वह काफी पढ़ा-लिखा था. वह बच्चियों को
स्कूल पहुंचाने ले जा रहा था. इसके बाद दो-तीन बार उनलोगों से भेंट हुई पर दूरी
इतनी थी कि उनलोगों के मध्य बातों का विषय और माध्यम क्या था पता नहीं लग पाता था.
आज वह रिक्शावाला सामने से आता दिख ही गया. वही दो लडकियां बैठी थीं. इतनी सुबह, वह भी चेहरे पर मुस्कुराहट लिए इस ढलती
उम्र में मानों मेरी तरह सुबह की सैर में निकला हो. एकदम ऐसा लग रहा था कि उसके
पैर पैडल को लयबद्ध गोल घुमा रहे थे. कद-काठी और पहनावा किसी आम रिक्शेवाले की तरह, चेहरा भी धुप में झुलसा हुआ लंबा तिकोना पर
आँख में गजब की चमक थी. वह 65 के आस-पास का लग
रहा था. रिक्शा चलाने वाले अपनी उम्र से 10 वर्ष ज्यादा के ही
दीखते हैं. इच्छा तो हुई कि उसे रोककर उसके बारे में और जानें पर सोचने में जितना
वक्त गुजरा उसमें वह बहुत आगे निकल गया. मैं भी उसी दिशा में बढ़ गया जिधर वह
रिक्शा वाला गया था. कोई 100 मीटर चलने के बाद बाईं तरफ मोड़ पर स्कूल बस स्टैंड पर खड़ी दिखी. लड़कियों को उतार कर वह वही रिक्शे पर
आराम से बैठ गया. वह जरूर उनकों बस पर चढाने के बाद ही वहां से जाएगा.
एक दिन फिर
दिखा. रिक्शे पर बैठे एक वृद्ध के लिए सब्जियां खरीद रहा था. सावले, तिकोने, लम्बे
चेहरे पर बढ़ी हुई दाढ़ी उसका मजहब बता रही थी. पर संतोष भरे चेहरे पर चमकती आँखे
बहुत कुछ और भी बता रही थी.
2-3 महीने की उत्सुकता भरी जानकारी जो इक्कठी हुई
वह इस प्रकार है.
वह वृद्ध मुसलमान रिक्शेवाला कभी बुक-बाईंडिंग का
काम करता था. वहीं किताबों के ढेर ने उसे पढ़ा लिखा कर सयाना किया. शायद थोडा ज्यादा
और बहुत ठीक तरह से.
बाल-बच्चों को बसाने और औरत के इंतकाल के बाद वह
अकेले बहुत दूर किसी भी अनजान आशियाने की खोज में निकल पडा. सबसे मुफीद जगह उसको
यही मदरसे और मस्जिद की पिछली दीवारों से सटी एक 8/8 की खोली में मिली. बस सुबह
ज़िंदा रहने भर के लिए कमा लिया करता. तबियत पसंद समय तक सुबह के समय की रिक्शा
चालन उसके स्वास्थ्य को ठीक रखती. बाकी समय वह किताबों और रद्दी अखबारों में उलझा
रहता. कहने की आवश्यकता नहीं है कि उसका सुफिआना अंदाज जाहिर कर रहा था कि ज्यादातर
जहीन पढाई ही करता होगा.
खोली के बाहर जरूरत पड़ने पर ही चुल्हा जलता था.
ज्यादातर उसके भोजन का इन्तजाम उसके सवारीवाले कर दिया करते थे. रिक्शा वह सुबह ही
चलाता था जिससे उसकी जरूरत पूरी हो जाती थी. हाँ वह कुछ पैसे बैंक मे जोड़ता रहता था जिसका कारण वह नहीं बता पाया. उसने बड़ी मासूमियत से मुस्कुराते हुए कहा कि उसके जानकार और मदरसे
वाले उसके कफ़न का इन्तजाम कर देंगे.
इस तरह का चरित्र मुझे सॉमरसेट मॉम के "रेजर'स एज" में दिखा था. नायक लैरी सबकुछ आजमाने के बाद टैक्सी चलाने लगता है. हर समय नए लोग,
नयी जगह; जुड़ पाने की कोई संभावना नहीं.
और बाद में आयन रैंड के "फाउंटेनहेड" में दिखा था. आर्किटेक्ट
नायक रोर्क कोयले की खदान में मशक्कत करने चला जाता है.
पुनःश्च 12.09। 2025 :
आज जब मैं 10:00 बजे सुबह व्हीलचेयर पर घूमने निकला तो मुझे वही रिक्शावाला 10
वर्ष बाद एक गुलमोहर के पेड़ के नीचे बैठा दिखा। वैसा ही शांत चेहरा और तीखी नजरें।
मैंने तो उसे तुरंत पहचान लिया पर वह उसे काफी देर लगी वह भी तब जब मैं उसे 10 वर्ष
पहले की बातें याद दिलाई । उसने ज्यादा उम्र के कारण रिक्शा चलाना कब का छोड़ दिया था
। उसने पास ही एक छोटा सा घर बना लिया था। उसका एक बड़ा बेटा फौज से रिटायर होने के बाद उसे
खोज ही निकाला। उसका बेटा अब एक सिक्योरिटी एजेंसी में काम करता है । वह अपने बच्चों के साथ अपने अब्बू के पास
ही रहता है। अब इरफान सुबह की सैर के बाद कोई मुफीद जगह देख कर थोड़ी देर आराम कर अपने घर लौटता है।
कोई कितना भी पैसेवाला हो, अमीर हो, वह बड़ा तो हो सकता है पर
महान नहीं. महात्मा गाँधी की महानता उनकी सादगी में निहित थी. मैं बहुत पहले श्री
जहांगीर रतनजी दादाभोई टाटा का टीवी पर इंटरव्यू देख रहा था. उनसे प्रश्न पूछा
गया- "आपको तो रफ्तारों का बाजीगर कहा जाता है. देश में पहली हवाई उड़ान का श्रेय
भी आपही को जाता है. आज भी इस उम्र में आप अपनी कार खुद ही ड्राइव करते हैं. अगर
कोई आपको ओवरटेक करना चाहता है तो क्या आपको क्रोध नहीं आता है." टाटा ने
मुस्कुराते हुए जवाब दिया- "नहीं ! अच्छा लगताहै जोश देखकर. मैं तुरत उसे आगे बढ़ने की जगह दे
देता हूँ." जब उनसे पूछा गया- " आप तो अपने पांच सितारा होटल ताज के सुइट
में अकेले रहतेहैं. आप तो तरह-तरह की
नायाब खाने का लुत्फ़ उठाते होगें." उनका जवाब था- " मैं अरसे से उबले
हुए आंटे की दो रोटी और उसके साथ कोई भी उबली सब्जी और बदलाव के साथ कुछ सलाद ही
स्वाद लेकर खाता हूँ." शायद और कोई बोलता होता तो मुझे शक भी होता पर उनके
बोलने में जो शालीनता और सादगी थी उसने उसकी कोई गुंजाईश छोड़ी ही नहीं.
दिवंगत श्री तीरख राम गुप्ता का ब्यौरा इन्टरनेट पर खोजने पर
भी नहीं मिलता है. पर उषा ग्रुप से भला कौन नहीं परिचित होगा. इस साम्राज्य की नीव
और उसके व्यापार को इन्होने ही सवारा था. नेहरु जी ने इन्हें अपने चहेते हैवी
इंजीनियरिंग कारपोरेशन, रांची को ट्रैक पर लाने के लिए इन्हें ही 1965 में चेयरमैन
बनाकर भेजा था. मेरे पिताजी बिहार सरकार की तरफ से डेपुटेशन पर सेक्रेटरी के पद पर
कार्यरत थे. पिताजी अपनी सेहत के कारण घर की बनी चार पतली रोटियाँ और उबली हुई
सब्जी ले जाते थे लंच के लिए. बाद में छः ले जाने लगे. मालूम हुआ चेयरमैन गुप्ताजी
जब भी हेडक्वार्टर में रहते, लंच शेयर करने पिताजी के कमरे में आ जाया करते.
1969 के आस-पास,एक बार, पिताजी बोर्ड की मीटिंग में शामिल होने
दिल्ली जा रहे थे. इंडियन एयरलाइन्स का पंखों वाला फोक्कर फ्रेंडशिप हवाई जहाज
कलकत्ता से रांची, पटना, लखनऊ होते हुए दिल्ली जाता था. 50 यात्रियों का यह प्लेन शायद सप्ताह में 3 उड़ान लेता था । नहीं याद है कि उस
चार-पांच घंटे की फ्लाइट में लंच दिया जाता था या नहीं पर पिताजी अपना भोजन अपने
साथ ले जाते थे. प्लेन में खिड़की वाली सीट पर पहले से कोई 70 के आस-पास के बुजुर्ग
बैठे हुए थे. वे अस्वस्थ तो नहीं दिख रहे थे पर एयर होस्टेस उनका कुछ ज्यादा ही
ख्याल रख रही थी. शायद और कोई तकलीफ हो. देखने से कोई पढ़े-लिखे भले व्यापारी लगते
थे. रास्ते भर वे अपनी फाइल के पन्नों में उलझे रहे. पिताजी को यह समझ में नहीं आ
रहा था कि उन सुइट-टाई पहने महानुभाव को खिड़की वाली सीट लेने की क्या जरूरत थी.
पिताजी ठीक एक बजे दिन में अपना भोजन कर लेते थे पर बगल वाली सीट के सामने लंच का
डिब्बा खोलने में संकोच हो रहा था वह भी सूखी रोटियों वाला. उन महानुभाव को शायद
इसका भान हो गया या फिर वह भी इसी समय लंच लिया करते थे. उन्होंने पैर के पास पड़े
बैग से सुन्दर सा लंच का डब्बा निकाला और उसे खोला. अरे ! उसमें भी ठीक उसी शक्ल
की रोटी और सब्जिया. सारा संकोच खत्म हो गया. उन महानुभाव ने उसके बाद कोई दस मिनट
पिता जी से उनके बारे में और कंपनी की सेहत के बारे में बातें की और फिर वे अपनी
फाइल में उलझ गए. दिल्ली आ गया. पिताजी से हाथ मिलाकर वे बुजुर्ग तेजी से उठकर
दरवाजे की तरफ लपके. एयर होस्टेस ने भी उनकी आगवानी कर उनका उतरना सहज बना दिया.
पिताजी ने उन महानुभाव का नाम तक नहीं जाना था. दरवाजे से बाहर निकलते वक्त
उन्होंने होस्टेस से पूछा कि क्या वह उन्हें जानती है.
वह बुजुर्ग और कोई नहीं श्री घनश्याम दास बिरला थे .